जैविक और प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सह प्रदर्शनी सफलतापूर्वक संपन्न

साईखेड़ा/ सौसर – भारत में टिकाऊ कृषि की दिशा में एक और बड़ा कदम! जी एच रायसोनी विश्वविद्यालय, साईखेड़ा के सहयोग से भारत सरकार के कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा आयोजित "जैविक और प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सह प्रदर्शनी" का भव्य आयोजन 22 फरवरी को वनमती ऑडिटोरियम, नागपुर में और 23 फरवरी को जी एच रायसोनी विश्वविद्यालय, साईखेड़ा में संपन्न हुआ। इस महत्वपूर्ण आयोजन ने कृषि विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं, प्रगतिशील किसानों और शिक्षाविदों को एक मंच पर लाकर टिकाऊ और प्राकृतिक खेती के उज्ज्वल भविष्य की रूपरेखा तैयार की।
विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति
संगोष्ठी में कृषि जगत की प्रतिष्ठित हस्तियों ने शिरकत की। मुख्य अतिथि मनोज सोलंकी, पूर्व संयुक्त सचिव एवं राज्य निर्वाचन आयुक्त (तेलंगाना) मैडम रानी कुमुदानी (आईएएस), पद्मश्री पुरस्कार विजेता श्री वेंकट रेड्डी और श्री भरत भूषण त्यागी, परभणी कृषि विद्यापीठ के कुलपति डॉ. इंद्रमणि मिश्रा, जी एच रायसोनी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री सुनील रायसोनी और कुलपति डॉ. मीना राजेश, डॉ. अजय सिंह राजपूत (क्षेत्रीय निदेशक, RCONF), डॉ. केविन गवली (डीन, जी एच रायसोनी विश्वविद्यालय) और डॉ. प्रवीण वूटला सहित कई गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को विशेष बना दिया।
संगोष्ठी में महत्वपूर्ण चर्चाएँ एवं प्रदर्शनी
इस संगोष्ठी में जैविक और प्राकृतिक खेती की नवीनतम तकनीकों, सरकारी नीतियों, टिकाऊ कृषि समाधानों और किसानों की सफलता की कहानियों पर गहन चर्चा हुई। प्रदर्शनी में पर्यावरण के अनुकूल कृषि उत्पादों, जैव-उर्वरकों और जैविक खेती को बढ़ावा देने वाली नवीनतम तकनीकों का प्रदर्शन किया गया, जिससे किसानों को नए दृष्टिकोण और नवाचारों की जानकारी मिली।
पद्मश्री भरत भूषण त्यागी का प्रेरणादायक संदेश
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए पद्मश्री भरत भूषण त्यागी ने कहा, "जैविक और प्राकृतिक खेती केवल एक कृषि पद्धति नहीं, बल्कि यह हमारे पर्यावरण, मिट्टी और मानव स्वास्थ्य को संरक्षित करने की एक जीवनशैली है। हमें पारंपरिक कृषि ज्ञान को संरक्षित रखते हुए नवाचारों को अपनाने की जरूरत है, ताकि हम अगली पीढ़ी को स्वस्थ और समृद्ध भविष्य दे सकें।" उन्होंने किसानों को आत्मनिर्भर बनने के लिए सामुदायिक खेती और नवाचारों पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी।
पद्मश्री वेंकट रेड्डी का प्रेरक वक्तव्य
पद्मश्री वेंकट रेड्डी ने अपने उद्बोधन में जैविक और प्राकृतिक खेती की सामाजिक और आर्थिक प्रभावशीलता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, "हमें अपनी कृषि पद्धतियों में प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अति प्रयोग ने हमारी मिट्टी और जल को प्रभावित किया है, लेकिन जैविक और प्राकृतिक खेती इस संकट से उबरने का एकमात्र समाधान है।" उन्होंने इस तरह के आयोजनों की सराहना की और किसानों को जैविक उत्पादों की मार्केटिंग और ब्रांडिंग पर भी ध्यान देने की सलाह दी, जिससे उनकी आय में वृद्धि हो सके।
इन प्रख्यात हस्तियों के विचारों ने संगोष्ठी में उपस्थित सभी किसानों और विशेषज्ञों को प्रेरित किया और जैविक खेती के प्रति एक नया उत्साह पैदा किया।
डॉ. केविन गवली का विशेष संदेश
सभा को संबोधित करते हुए डॉ. केविन गवली ने आधुनिक अनुसंधान और पारंपरिक जैविक खेती तकनीकों के संयोजन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि "यदि हम पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक नवाचारों से जोड़ दें, तो हम एक टिकाऊ कृषि भविष्य की ओर अग्रसर हो सकते हैं।"
भविष्य के लिए नए मार्ग प्रशस्त
कार्यक्रम का समापन एक गतिशील पैनल चर्चा और इंटरैक्टिव प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ, जिसमें कृषि क्षेत्र में नवाचार और भविष्य की रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया गया। इस संगोष्ठी ने कृषि अनुसंधान, जैविक खेती और प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न संस्थानों और किसानों के बीच सहयोग के नए अवसर खोल दिए।
सफल आयोजन के पीछे मेहनती टीम
इस भव्य आयोजन की सफलता का श्रेय RCONF के श्री वूटला, श्री स्वपनिल मगर एवं डॉ चेतन बोन्दरे डॉ. परेश बाविस्कर, डॉ. आशुतोष राजौरिया, प्रो. शुभाशीष रक्षित, डॉ. आशीष सारडा, डॉ. राकेश तुरकर और स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज, जी एच रायसोनी विश्वविद्यालय, साईखेड़ा की समर्पित टीम को जाता है। उनकी सटीक योजना और निष्पादन ने इस संगोष्ठी को एक प्रभावशाली और प्रेरणादायक आयोजन बना दिया।
निष्कर्ष
"जैविक और प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सह प्रदर्शनी" की भव्य सफलता यह दर्शाती है कि भारत में टिकाऊ कृषि की ओर किसानों की रुचि और जागरूकता लगातार बढ़ रही है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से न केवल उन्नत कृषि तकनीकों का आदान-प्रदान होता है, बल्कि किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी ठोस कदम उठाए जाते हैं। यह संगोष्ठी कृषि के सुनहरे भविष्य की ओर एक और बड़ा कदम साबित हुई।