श्रीमान ! उम्मीद है आपके आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित ना रहे,जमीन पर भी दिखाई दें

दिव्य चिंतन
उम्मीद का अरुणोदय!
हरीश मिश्र
रायसेन l मौनी अमावस्या की पवित्र सुबह! सूरज की हल्की किरणें धरती को छू रही थीं और पूरे माहौल में एक अनोखी शांति थी। न ज्यादा ठंड थी, न गर्मी—बस एक सुकून भरा मौसम।
इसी बीच खबर आई कि नवागत कलेक्टर अरुण कुमार विश्वकर्मा ने पदभार संभाला लिया, यह सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं था, बल्कि उम्मीद की एक नई किरण थी।
समय बीता, दिन बदले, नक्षत्र बदले और आज इस बदलाव को तीस दिन पूरे हो गए। इन तीस दिनों में आम आदमी की कई उम्मीदें जागी हैं।
उम्मीद—एक छोटा सा शब्द है, लेकिन इसकी गहराई में गरीबों का दर्द, किसानों की पीड़ा, बेरोजगार की व्यथा और छात्रों के सपने छिपे हैं। उम्मीद गिरकर उठने की हिम्मत देती है, सपनों को उड़ान देती है। जब रास्ते कठिन हों, मंज़िल धुंधली लगे और हौसला डगमगाए—तब सिर्फ उम्मीद ही सहारा बनती है।
जिले के गरीब, किसान, बेरोजगार और छात्रों को उम्मीद थी कि कोई मसीहा आएगा, कंधे पर हाथ रखेगा और कहेगा— चिंता मत करो, "मैं हूं ना!" ऐसा ही हुआ, आते ही आपने गरीब, किसान, बेरोजगार और छात्रों के कंधे पर हाथ रखकर कहा,
चिंता मत करो,
"मैं हूं ना!"
पदभार ग्रहण करने के बाद श्रीमान! आपने कलेक्ट्रेट कार्यालय की सभी शाखाओं का निरीक्षण किया, लेकिन उन शाखाओं, कार्यालयों का निरीक्षण अभी करना बाकी है, जहां बरसों से लाल चंदन लगाए भ्रष्ट अघोरी बैठे हैं। जो भूखे नहीं है, पर छप्पन भोग जीमते हैं। फाइल खोलना और दबाना इनका लाभ का धंधा है।
आपने अस्पताल का आकस्मिक निरीक्षण कर मरीजों के उपचार और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति का जायजा लिया, लेकिन आउटसोर्स कर्मचारियों के आंसू नहीं देखे। एक बार पूछें जरूर, बिन पिचकारी और रंगों के होली कैसे मनाएंगे, कड़वा सच ये है, भरे पेट ठेकेदार और अस्पताल प्रबंधन मिलकर उनका आधा मासिक वेतन हड़प कर फाग खेल रहे हैं।
आपने छात्रावास में रह रहे छात्र के कंधे पर हाथ रखा, छात्रों की उम्मीद जागी, लेकिन चुप रहकर सहने वाले छात्रों की किस्मत का भी अजीब किस्सा है—दाल, रोटी, चावल में भी कुछ अधीक्षकों का हिस्सा है।
लोकतंत्र के उत्सव में ऊंगली पर स्याही लगाकर गरीब सरपंच को करोड़पति बनाने वाला दीनदयाल प्रधानमंत्री आवास से वंचित है।
सरपंच और सचिव ने
कागज में आंगनबाड़ी बना दी, फाइल में आवास । सब मिलकर खा रहे, बचा रहे हैं इनको माई बाप।
स्कूलों में भव्य भवन तो बन गए, लेकिन कुछ कामचोर, खलनायक, शिक्षक, बाबू बनकर, नेता बन, सामाजिक कार्यकर्ता बन सोशल मीडिया पर धूम मचा रहे हैं।
नागरिक आपूर्ति निगम, आबकारी, खनिज, वन, लोक निर्माण , पंचायत, सामाजिक न्याय, शिक्षा , खाद्य , खेल , मत्स्य, स्वास्थ्य विभाग में ऐसा जंगल राज फैला है, जो बाबू सबसे ज्यादा चरते है, उनके सिर पर ही ताज रखा है। इन विभागों के, भ्रष्ट अघोरी कुंभ नहा आए हैं।
श्रीमान ! उम्मीद है, आपके आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि ज़मीन पर भी दिखाई दें। तभी न्याय की राह सीधी होगी, भ्रष्टाचार खत्म होगा और सच की जीत होगी।
श्रीमान ! आपके औंचक निरीक्षण से भ्रष्ट अधिकारियों, कामचोर कर्मचारियों और लापरवाह शिक्षकों में जो डर पैदा हुआ था, वह कमजोर पड़ने लगा है।
तुलसीदास जी ने लिखा है
"भय बिनु होइ न प्रीति..."
अर्थात्, जहां अनुशासन और सख़्ती नहीं होती, वहां सुधार भी संभव नहीं। विनम्रता हर जगह काम नहीं करती, कई बार सख्ती ज़रूरी होती है। केले का पेड़ कितना भी बड़ा हो जाए, लेकिन फल तभी देता है जब उसे काटा जाता है। इसी तरह, भ्रष्ट लोग सिर्फ समझाने से नहीं बदलते, उन्हें अनुशासन में लाना पड़ता है।
आपसे उम्मीदें...
आप गरीबों की आवाज़ बनें, हर घर में खुशहाली लाएं। आपका हर फैसला जनता की तक़दीर बदले। आशा है आप नया इतिहास लिखेंगे और प्रशासन को नई दिशा देंगे।
अब देखना यह है कि आपकी कोशिशें सिर्फ शुरुआत तक सीमित रहती हैं या फिर व्यवस्था में वास्तविक सुधार लाती हैं। जनता इंतजार कर रही है… उम्मीद के सूरज के पूरी तरह से निकलने का!
लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )