एकीकृत कृषि प्रणाली पर जबलपुर में बनी लघु फिल्म का कृषि उत्पादन आयुक्त ने किया विमोचन
जबलपुर के युवा कृषक तन्मय दास के एकीकृत कृषि प्रणाली के मॉडल पर बनाई गई लघु फिल्म अब प्रदेश भर में किसानों को दिखाई जायेगी। प्रदेश के कृषि उत्पादन आयुक्त के सी गुप्ता ने गत दिवस अपने जबलपुर प्रवास के दौरान इस लघु फिल्म का विमोचन किया। वहीं, रबी की समीक्षा और खरीफ की तैयारियों पर आयोजित की जा रही संभाग स्तरीय बैठकों में सभी जिलों के कृषि अधिकारियों के समक्ष इस फिल्म का प्रदर्शन भी किया गया। ज्ञात हो कि इलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग के छात्र तन्मय दास ने जबलपुर जिले के पाटन विकासखंड के ग्राम लम्हेटा में करीब साढ़े तीन एकड़ की भूमि पर एकीकृत कृषि प्रणाली को अपनाकर एक ही स्थान पर कृषि से जुडी कई गतिविधियों को जोड़ने का सफल उदाहरण प्रस्तुत किया है।
किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के जिला कार्यालय जबलपुर द्वारा बनाई गई यह लघु फिल्म किसानों को पारंपरिक खेती से बाहर निकालकर एक ही स्थान पर कई तरह की कृषि गतिविधियों को जोड़ने के वैज्ञानिक तौर-तरीकों को बेहद सरल भाषा में समझाती है।
क्या है एकीकृत मॉडल और इसकी खासियत :-
एकीकृत कृषि प्रणाली एक ऐसी वैज्ञानिक पद्धति है जहाँ खेती के साथ-साथ पशुपालन, मत्स्य पालन, मुर्गी पालन और बागवानी (फल-सब्जी) को एक ही जमीन पर इस तरह संयोजित किया जाता है कि वे एक-दूसरे के पूरक बन जाएं।
इस पूरे मॉडल का मूल मंत्र है "एक इकाई का अवशेष, दूसरी इकाई के लिए संसाधन।" यानी खेत या पशुओं से निकलने वाला कचरा बर्बाद नहीं होता, बल्कि वह दूसरी गतिविधि में मुख्य इनपुट (सामग्री) के रूप में काम आता है।
पशुओं के गोबर और मूत्र से बायोगैस तथा उत्तम दर्जे की जैविक खाद बनाई जाती है, जिसका उपयोग सीधे खेतों में होता है। दूसरी ओर, फसलों के बचे हुए अवशेष (पशु चारा) जानवरों के काम आते हैं। जब खाद, कीटनाशक और चारा खेत में ही तैयार हो जाता है, तो बाजार पर किसान की निर्भरता न्यूनतम हो जाती है। इससे खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आती है।
वर्ष भर नियमित आमदनी :-
पारंपरिक खेती में किसान को सिर्फ फसल कटाई के समय (साल में दो या तीन बार) ही एकमुश्त पैसा मिलता है। लेकिन इस प्रणाली से दूध, अंडे, फल और सब्जियों के जरिये किसान को दैनिक या साप्ताहिक आय मिलती रहती है। बेहतर जोखिम प्रबंधन :- यदि मौसम की मार या बीमारी के कारण कोई एक फसल खराब भी हो जाए, तो पशुपालन, मुर्गी पालन या मत्स्य पालन से किसान की आर्थिक स्थिति सुरक्षित रहती है और उसे भारी नुकसान नहीं झेलना पड़ता। मृदा स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण: रासायनिक खादों की जगह जैविक कचरे और गोबर की खाद का उपयोग होने से भूमि की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक बनी रहती है। लघु फिल्म के विमोचन के अवसर पर किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के संयुक्त संचालक जबलपुर के एस नेताम, उप संचालक कृषि उमेश कटहरे, अनुविभागीय कृषि अधिकारी पाटन डॉ इंदिरा त्रिपाठी, कृषि विस्तार अधिकारी हरीश बर्वे एवं युवा कृषक तन्मय दास उपस्थित रहे।
ग्रामीण अंचलों में होगा फिल्म का प्रसार :-
कृषि विभाग जबलपुर द्वारा समय-समय पर दिए गए तकनीकी सहयोग और मार्गदर्शन को भी इस फिल्म में प्रमुखता से रेखांकित किया गया है। किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस लघु फिल्म को ग्रामीण अंचल, किसान संगोष्ठियों और डिजिटल माध्यमों पर व्यापक रूप से प्रसारित किया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक किसान इस उन्नत मॉडल को अपनाकर आत्मनिर्भर बन सकें और अपनी आय में वृद्धि कर सकें।


