बिना रासायनिक खाद के उपयोग के पैदा होती है कोदौ

रीवा l चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. बीएल मिश्रा ने कहा है कि कोदौ की खेती सदियों से भारत व कई अन्य देशों में होती रही है। इस फसल की खासियत है कि यह कम पानी की उपलब्धता या सूखा (अकाल) के दौरान भी बिना रासायनिक खाद के उपयोग के पैदावार होती है। कोदौ का उपयोग चावल के विकल्प के रूप में होता है। इसकी प्रकृति ठंडक होती है। यह मिलेट्स या विभिन्न मोटा आनाजो में से एक है। पुराने समय से कोदौ को गरीबों का अनाज माना जाता था। वर्तमान में इसके विभिन्न गुणो के कारण ही इस अनाज की कीमत बढ़ी है तथा लोग शौक से चावल के विकल्प व औषधि रूप में खाते हैं। बड़ी संख्या में कृषक कोदौ की खेती में काफी रूचि ले रहे हैं।
मोटे अनाज कोदौ में स्वास्थ्य की दृष्टि से विभिन्न अवयव कार्बोहाइड्रेट (66 प्रतिशत), प्रोटीन(8ऽ), चर्बी (1.5 प्रतिशत), एंटीऑक्सीडेंट, फाइबर, कैल्शियम, विभिन्न विटामिन और जिंक के साथ कई विरले तत्व (मैग्नीशियम, फास्फोरस, सोडियम, पोटेशियम) उपस्थित रहते हैं। यह मिलेट्स कोदौ भोजन के प्रमुख अवयव के अतिरिक्त विभिन्न बीमारियों की रोकथाम में लाभदायक है। यह बीमारियों डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, मोटापा, कोलेस्ट्रोल का बढ़ना, विभिन्न बीमारियों से रोकथाम (किडनी, लीवर,हृदय रोग, विभिन्न कैंसर, गठिया वात, पित्तट्ठ किडनी में पथरी बनना, चमड़ी व बाल में सौंदर्य, अस्थियों की मजबूती में भी सहायक है। प्रति व्यक्ति अधिकतम 100 ग्राम तक चावल के विकल्प के रूप में पकाकर,खीर,उपमा, पुलाव ,हलवा व पापड़ के रूप में अन्य अनाज-चना, गेहूं,मूंग, व दूध तथा अपनी पसंद के मसालों के साथ इसे उपयोग में लिया जा सकता है। अनाज को मिल में दराई करने के पश्चात कूटकर उपचारित करें व साफ पानी में धोकर उपयोग करें। कोदौ पूर्णत: सुरक्षित है व खाने पर मृत्यु की संभावना शून्य है. किंतु कभी-कभी स्वच्छता के अभाव में उल्टी,दस्त, मतली हो सकती है।