यह कहानी है बालाघाट जिले की जनपद पंचायत लालबर्रा के ग्राम पंचायत लोहारा के एक ऐसे किसान की, जिन्होंने सरकारी योजनाओं के सही क्रियान्वयन और अपनी मेहनत के दम पर अपनी तकदीर खुद लिखी है। किसान धनेंद्र लक्ष्मण, जो कभी खेती के लिए केवल मानसून की बारिश का इंतज़ार करते थे, आज मनरेगा (MGNREGA) की 'कपिलधारा कूप' योजना के सहारे आत्मनिर्भर बन चुके हैं।साल 2019 से पहले, धनेंद्र लक्ष्मण की खेती की कहानी कुछ ऐसी ही थी, जैसी अधिकांश छोटे किसानों की होती है पूरी तरह वर्षा पर निर्भर। सिंचाई का कोई स्थायी साधन न होने के कारण, वे साल में केवल एक बार धान की फसल ले पाते थे। इससे होने वाली आय परिवार के खर्चों के लिए पर्याप्त नहीं थी, जिसके कारण आर्थिक तंगी हमेशा बनी रहती थी।

किसान के संघर्ष को देखते हुए, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत उनके खेत में 'कपिलधारा कूप' निर्माण को स्वीकृति मिली। कूप बनने के बाद जैसे उनके खेतों के दिन फिर गए। अब उन्हें सिंचाई के लिए बादलों की ओर नहीं ताकना पड़ता। साल के 12 महीने पानी की उपलब्धता ने खेती का पूरा भूगोल ही बदल दिया। सिंचाई की स्थायी सुविधा मिलते ही धनेंद्र ने अपनी कृषि पद्धति में बदलाव किया। धान की पारंपरिक खेती के साथ-साथ उन्होंने रबी की फसलों और बागवानी (सब्जियों) की ओर रुख किया। आज उनके खेत में साल भर हरियाली रहती है और अलग-अलग फसलों का उत्पादन होने से उनकी वार्षिक आय में कई गुना वृद्धि हुई है।

अपनी इस सफलता पर धनेंद्र लक्ष्मण कहते हैं, "कपिलधारा कूप केवल जमीन के अंदर बना पानी का स्रोत नहीं है, यह मेरे परिवार की खुशहाली की नींव है। इस योजना ने न केवल मुझे सिंचाई की सुविधा दी, बल्कि मुझे भविष्य के प्रति आत्मविश्वास भी दिया है।"ग्राम पंचायत लोहारा में धनेंद्र लक्ष्मण की सफलता की यह कहानी अब दूसरे किसानों के लिए एक नजीर बन गई है। उनकी कामयाबी यह साबित करती है कि यदि जल संरक्षण और कृषि के आधुनिक साधनों को सही ढंग से जोड़ा जाए, तो छोटे किसान भी अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ कर सकते हैं। मनरेगा के तहत निर्मित यह कपिलधारा कूप आज न केवल धनेंद्र के खेतों को सींच रहा है, बल्कि क्षेत्र के अन्य किसानों को भी नवाचार और तरक्की की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है।