अवंतिका की पावन धरा पर 2028 में होगा, भव्य, दिव्य और अलौकिक सिंहस्थ वाराणसी में ऐतिहासिक मंचन से सांस्कृतिक नवजागरण का होगा उदय
भोपाल l मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि भारतीय काल-गणना के प्रणेता और न्यायप्रियता के प्रतीक चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के शौर्य की गाथा अब बाबा विश्वनाथ की नगरी वाराणसी की गलियों में प्रतिध्वनित होगी। धर्म और संस्कृति की नगरी वाराणसी के बी.एल.डब्ल्यू. मैदान में आगामी 3 से 5 अप्रैल, 2026 (विक्रम संवत् 2083, वैशाख कृष्ण पक्ष) तक भारत के स्वाभिमान और विकास की गाथा का भव्य उत्सव मनाया जाएगा। मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस त्रि-दिवसीय कार्यक्रम में महानाट्य 'सम्राट विक्रमादित्य' का ऐतिहासिक मंचन किया जाएगा।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के गौरवशाली नेतृत्व में यह आयोजन भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों को जीवंत करेगा। इस गरिमामय समारोह का शुभारंभ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं केंद्रीय संस्कृति व पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की उपस्थिति में होगा। इस वृहद आयोजन का उद्देश्य देश के गौरवशाली इतिहास, विक्रम संवत् की वैज्ञानिकता और उस युग के अनुपम योगदान से जन-मानस को परिचित कराना है।
बाबा विश्वनाथ को विक्रमादित्य वैदिक घड़ी करेंगे अर्पित
प्राचीन भारतीय कालगणना के ऐतिहासिक केंद्र उज्जैन में पिछले वर्ष विश्व की पहली 'विक्रमादित्य वैदिक घड़ी' की सफल स्थापना के बाद, अब इसे देश के अन्य ज्योतिर्लिंगों तक पहुँचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। भारतीय काल गणना की समृद्ध विरासत को पुनर्जीवित करने के इस प्रयास अन्तर्गत वाराणसी में सर्वप्रथम बाबा विश्वनाथ को यह वैदिक घड़ी समर्पित की जा रही है। इस घड़ी की विशेषता न केवल इसकी पारंपरिक गणना पद्धति है, बल्कि इसका डिजिटल विस्तार भी है। इसके लिए एक विशेष ऐप भी लॉन्च किया गया है जो विश्व की 180 से अधिक भाषाओं में समय और पंचांग की जानकारी उपलब्ध करा रहा है। उज्जैन से शुरू होकर काशी के गलियारों तक पहुँचने वाली यह पहल न केवल हमारी सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध कर रही है, बल्कि भारतीय वैज्ञानिक धरोहर को वैश्विक स्तर पर पुनः स्थापित करने का कार्य भी कर रही है।
महानाट्य के सांस्कृतिक गौरव की निरंतर यात्रा
सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य की यात्रा वर्ष 2007 में प्रारंभ हुई थी। सफलता के सोपान चढ़ते हुए इस नाटक का मंचन अब तक उज्जैन, भोपाल, आगरा और हैदराबाद जैसे प्रमुख शहरों में किया जा चुका है, जहाँ हज़ारों दर्शकों ने इसे सराहा है। अप्रैल 2025 में दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर आयोजित इसके मंचन को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भी विशेष रूप से सराहा था। उन्होंने इस प्रस्तुति को सम्राट विक्रमादित्य के वैभव और भारतीय गौरव को जन-जन तक पहुँचाने का एक अनुकरणीय प्रयास बताया।
महानाट्य विक्रमादित्य: शौर्य और न्याय का संगम
सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य उज्जैनी के महान सम्राट के जीवन, उनके अदम्य साहस और न्यायप्रियता को जीवंत करता है। नाटक के माध्यम से 57 ईसा पूर्व प्रारंभ हुए 'विक्रम संवत्' के ऐतिहासिक और वैज्ञानिक महत्त्व को सशक्त संवादों द्वारा प्रस्तुत किया गया है। दर्शकों को इसमें जहाँ 'सिंहासन बत्तीसी' और 'बेताल पच्चीसी' के रोचक प्रसंग देखने को मिलेंगे, वहीं भविष्य पुराण के गंभीर संदर्भों से भी परिचय होगा।
महानाट्य प्रस्तुति का एक मार्मिक पक्ष विदेशी आक्रांताओं द्वारा भारतीय ज्ञान, विज्ञान और सांस्कृतिक धरोहर को पहुँचाई गई क्षति को भी दर्शाना है। इसके साथ ही सम्राट विक्रमादित्य के दरबार के 'नवरत्नों'—महाकवि कालिदास और महान खगोलशास्त्री वराहमिहिर—की विद्वता को भी बड़े प्रभावशाली ढंग से मंच पर उतारा गया है।


