सरकारी बजट से हाथी तो खरीद लिया गया, लेकिन उसके चारे-पानी की व्यवस्था किसी की प्राथमिकता ही नहीं थी
दिव्य चिंतन
पांच महीने में क्यों बंद हो गया जैविक हाट?
हरीश मिश्र ( 9584815781 )
सरकारी योजनाओं के कुछ प्रयोग ऐसे होते हैं जो शुरू होने से पहले ही अपने अंत की पटकथा लिख चुके होते हैं।
रायसेन में कृषि विभाग द्वारा प्रारंभ किया गया जैविक हाट बाजार शायद उन्हीं योजनाओं में से एक था।
13 दिसंबर 2025 को जिले के प्रभारी मंत्री नारायण सिंह पंवार ने सागर रोड स्थित सहायक भूमि संरक्षण अधिकारी कार्यालय परिसर में बड़े उत्साह के साथ इसका शुभारंभ किया था।
मंच सजा, भाषण हुए, उपलब्धियों के दावे किए गए और जैविक खेती के माध्यम से किसानों तथा उपभोक्ताओं के लिए एक नई व्यवस्था का सपना दिखाया गया।
मंत्री जी ने घोषणा की थी कि किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए बिचौलियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और उपभोक्ताओं को शुद्ध जैविक उत्पाद सहजता से उपलब्ध होंगे। लेकिन विडंबना देखिए कि पांच महीने बाद ही यह हाट बंद हो गया।
प्रश्न यह नहीं है कि हाट क्यों बंद हुआ। असली प्रश्न यह है कि क्या इसे चलाने की कोई ठोस और व्यवहारिक योजना थी भी या नहीं? क्या यह किसानों और ग्राहकों की आवश्यकताओं को समझकर बनाया गया बाजार था या फिर केवल एक ऐसा कार्यक्रम, जिसका उद्देश्य उद्घाटन कराना और उपलब्धियों की सूची में एक नई मद जोड़ना था?
सरकारी अधिकारियों में एक अद्भुत प्रतिभा होती है। कुछ योजनाएं मांग को देखकर नहीं, फाइल को देखकर बनाई जाती हैं।"
रायसेन में वर्षों से रविवार को रामलीला मैदान और मुख्य मार्गों पर सब्जी बाजार लगता है, जहां लोग स्वाभाविक रूप से पहुंचते हैं। ऐसे में शहर से दूर, एकांत सरकारी परिसर में ग्राहक सब्जी खरीदने क्यों जाएगा, यह सरल प्रश्न शायद योजना बनाते समय किसी ने पूछा ही नहीं।
सच तो यह है कि कृषि विभाग के कुछ अधिकारी नारायण भक्ति में इतने तल्लीन दिखाई देते हैं कि जमीन की हकीकत से उनका परिचय सीमित रह जाता है। "लेकिन इसके लिए स्थायी व्यवस्था चाहिए, केवल कैमरों के सामने होने वाले उद्घाटन नहीं।"
जैविक हाट की कहानी भी कुछ ऐसी ही लगती है। उद्घाटन के दिन जनप्रतिनिधि मंच पर थे, सरकारी अमला था और कैमरे भी थे। जो नहीं था, वह था एक दीर्घकालिक कार्ययोजना और सुनिश्चित ग्राहक वर्ग। किसानों को नियमित रूप से जोड़ा नहीं गया, उपभोक्ताओं तक पर्याप्त जानकारी नहीं पहुंची और बाजार की व्यवहारिक चुनौतियों का गंभीर अध्ययन भी नहीं किया गया।
यदि इन मूलभूत प्रश्नों पर पहले काम किया गया होता, तो शायद पांच महीने में ताला लगाने की नौबत नहीं आती।
निस्संदेह जैविक खेती को बढ़ावा देना आवश्यक है। किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराना भी सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन इसके लिए स्थायी व्यवस्था चाहिए, केवल कैमरा नहीं। यदि किसी योजना का जीवनकाल पांच महीने ही हो, तो वह विकास का मॉडल नहीं बल्कि प्रशासनिक जल्दबाजी, सतही योजना निर्माण और संसाधनों के दुरुपयोग का दस्तावेज बन जाती है।
लोकतंत्र में सवाल केवल यह नहीं होता कि हाथी कितना बड़ा था। सवाल यह भी होता है कि उसे पालने का खर्च किसने उठाया, उसके लिए चारे की व्यवस्था क्यों नहीं की गई और अंततः वह हाथी गया कहां ?
"फिलहाल रायसेन के जैविक हाट की कहानी यही कहती है कि "सरकारी बजट से हाथी तो खरीद लिया गया, लेकिन उसके चारे-पानी की व्यवस्था किसी की प्राथमिकता नहीं थी।"
लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )


