दिव्य चिंतन

सोमेश्वर धाम-
आंदोलन से महोत्सव तक...

*सोमेश्वर धाम के द्वार कब खुलेंगे प्रतिदिन ?*

हरीश मिश्र

रायसेन किले की प्राचीर पर फाल्गुन की रात जब गहराती है, तो केवल चांद नहीं चमकता, आस्था का उजाला भी बिखरता है। महाशिवरात्रि की  रात, “हर-हर महादेव” का उद्घोष गूंजता है और भक्त रात्रि में उपासना कर
सोमेश्वर धाम  मुक्ति की कामना करते हैं।
    सोमेश्वर धाम पर शिवरात्रि की रात सामूहिक जागरण की रात्रि बन जाती है। दुर्ग की सीढ़ियां केवल पत्थरों की संरचना नहीं, जौहर की साक्षी, जुल्म  की स्मृति है। इतिहास कारों का मानना है कि इस स्थल का उल्लेख महाकवि कालिदास के ग्रंथों में  मिलता है। जो इसे केवल धार्मिकता नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत का दर्जा भी देता है।
   सन 1974 में शिवलिंग मंदिर से निकाल कर फेंक दिया गया था। पुनः स्थापना को लेकर  आंदोलन हुआ,जो आज़ादी के बाद जिले का सबसे बड़ा जनआंदोलन बना। जन आंदोलन के आगे सरकार को झुकना पड़ा, तब तात्कालीन मुख्यमंत्री पी. सी. सेठी ने शिवलिंग की स्थापना की थी। वह क्षण केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था; बल्कि सनातन अस्मिता की पुनर्स्थापना का प्रतीक था। जनसमूह ने संदेश दिया था कि जब आस्था पर प्रश्न उठता है, तो समाज स्वयं प्रहरी बन खड़ा होता है।
    इसके बाद समय की धूल  में कुछ परंपराएँ धुंधली पड़ीं। पर 1996 में मेले की पुनः शुरुआत हुई, तो उसे जन उत्सव का स्वरूप देने का श्रेय स्वर्गीय विनोद चौबे को जाता है। उन्होंने आयोजन को केवल औपचारिक नहीं रहने दिया ,उसमें युवाओं को जोड़ा। शिवरात्रि को पुनः आस्था से जोड़ा। 

   शिवरात्रि के दिन 50 से 60 हजार श्रद्धालु दर्शन करने सोमेश्वर धाम पहुंचते हैं।
लेकिन प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है,
क्या सनातन आस्था केवल एक दिन के लिए जाग्रत होती है।
क्या आस्था  केवल जल और बेलपत्र तक सिमट जाती है ?
शिव उपासना केवल अनुष्ठान नहीं, संकल्प है।
शिव भक्तों की आस्था तभी सार्थक होगी, सोमेश्वर धाम का महत्व तभी पूर्ण होगा, जब उसके द्वार केवल पर्व पर नहीं, प्रतिदिन श्रद्धा और आस्था के साथ भक्तों के लिए खुलेंगे।

लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार)