पंचम सरसंघचालक स्व. सुदर्शन जी की स्मृति में 17वें महोत्सव में सरफ़राज़ हसन के निर्देशन में वैचारिक नाटको का मंचन की श्रंखला में नाटक पार्क का मंचन किया गया
(सुनील सोन्हिया की रिपोर्ट)
भोपाल l यंग्स थिएटर आर्टिस्ट आर्ट एण्ड कल्चरल फाउंडेशन द्वारा केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, नई दिल्ली एवं संस्कृति संचालनालय म.प्र के सहयोग से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंचम सरसंघचालक रहे स्व. सुदर्शन जी की स्मृति में
तीन दिवसीय नाट्य समारोह सृजन महोत्सव में दूसरे दिन युवा लेखक मानव कौल का बहुचर्चित वैचारिक नाटक 'पार्क' की प्रभावी प्रस्तुति दृष्टिमन थिएटर होम नेहरू नगर में हुई।
सृजन महोत्सव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंचम सरसंघचालक स्व. सुदर्शन जी की स्मृति में निरंतर आयोजित होता आ रहा है एक प्रतिष्ठित सांस्कृतिक समारोह है। सुदर्शन जी यंग्स थिएटर को युवाओं के लिए राष्ट्रप्रथम के भाव जगाने व संस्कार तथा भारतीय परंपराओं जिससे समाज मे जागरण हो इसके लिए लगातर प्रोत्साहित करते थे समय समय पर संस्था कलाकारों से संवाद किया करते थे इसी आत्मिक जुड़ाव के लिए संस्था ने अपना यह सालाना महोत्सव उनकी स्मृति को समर्पित करते हुए इस महोत्सव के ज़रिए समाज को जोड़ने व वैचारिक नाटकों का प्रदर्शन करती है।
एसोसिएशन ऑफ सिनेमा एण्ड टेलिविज़न आर्टिस्ट ACTA के विशेष सहयोग से आयोजित समारोह में फ़िल्म अभिनेता व लेखक मानव कौल द्वारा लिखित नाटक 'पार्क' की प्रस्तुति प्रसिद्ध रंगकर्मी व अभिनय प्रशिक्षक नेशनल अवॉर्डी सरफ़राज़ हसन की परिकल्पना व निर्देशन में प्रस्तुत हुई।
नाटक की कहानी एक पार्क में घूमते हुए तीन मुख्य पात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं से जूझ रहे हैं और एक बेंच को लेकर एक छोटी सी लड़ाई में उलझे हुए हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति एक पिछली कहानी और एक तर्क प्रस्तुत करता है।
नाटक के तीनों पात्र अलग-अलग पृष्ठभूमि और जीवन के विभिन्न अनुभवों से जुड़े हुए हैं, लेकिन उन्हें एक साथ लाने वाला तत्व उनकी अपनी-अपनी अकेलापन और जीवन में कोई न कोई कमी का एहसास है।
कहानी एक पार्क में शुरू होती है, जहाँ तीनों पात्र अलग-अलग समय पर आते हैं। इन तीनों के बीच संवाद शुरू होता है, जो प्रारंभ में हल्के-फुल्के और मजाकिया स्वर में रहता है, लेकिन धीरे-धीरे गहरे और गंभीर मुद्दों की ओर मुड़ जाता है। वे एक दूसरे से अजनबी हैं, लेकिन उनके बीच एक सहज आकर्षण और जिज्ञासा पनपती है। पात्रों के बीच बातचीत धीरे-धीरे और गहरी होती जाती है, जहाँ वे अपनी असुरक्षाओं, असफलताओं, और अधूरी आकांक्षाओं के बारे में खुलकर बात करते हैं।
यह नाटक विशिष्ट शैली की रचना है जिसमें वह मानव जीवन की विडंबनाओं, उसकी छोटी-छोटी खुशियों, उसकी अनकही उदासियों, और उसकी गहरी उलझनों को बड़ी सहजता और संजीदगी के साथ प्रस्तुत करते हैं। यह नाटक रोज़मर्रा की जीवन स्थितियों के माध्यम से गहरे मानवीय भावनाओं और रिश्तों की पड़ताल करता है। यह नाटक मानवीय अस्तित्व की उन सच्चाइयों को सामने लाता है जिन्हें हम अक्सर नज़रअंदाज कर देते हैं या जिनसे हम अनजान होते हैं। "पार्क" न सिर्फ संवादों का आदान-प्रदान है, बल्कि यह जीवन की अनिश्चितताओं, आकांक्षाओं, और अज्ञात भावनाओं की खोज भी है।
संवादों में हँसी-मज़ाक, गहरी विचारधारा, और भावनात्मक उथल-पुथल का मिश्रण है, जो दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि मानव जीवन कितना जटिल और बहुस्तरीय हो सकता है। उनके संवादों में एक प्रकार की अंतरंगता होती है, जो उनके बीच की भावनात्मक दूरी को धीरे-धीरे मिटाती है। पार्क एक प्रतीक के रूप में उभरता है, जो उनकी आत्मा के भीतर की उलझनों, उनकी चाहतों, और उनकी अधूरी ख्वाहिशों का प्रतीक है।
नाटक का चरम उस समय आता है जब तीनों पात्र अपनी-अपनी जिंदगियों के सवालों का सामना करते हैं। वे एक-दूसरे को अपने मन की गहराइयों में झांकने का मौका देते हैं, और अंततः यह एहसास होता है कि वे सब अपने-अपने ढंग से जीवन के उस 'पार्क' में खोए हुए हैं, जहाँ हर किसी के पास अपनी-अपनी कहानी है, अपने-अपने दुःख और खुशियाँ हैं।
"पार्क" मुख्य रूप से अकेलेपन और जुड़ाव के बीच की खींचतान को दर्शाता है। तीनों पात्र अपनी-अपनी जिंदगियों में अकेले हैं, लेकिन वे एक-दूसरे से संवाद करते हुए एक अदृश्य धागे से जुड़ते हैं। पार्क यहाँ एक सुरक्षित स्थान की तरह उभरता है, जहाँ वे अपने जीवन की जटिलताओं से मुक्त होकर बात कर सकते हैं।
मंच पर :-
हुसैन - सार्थक सक्सेना
उदय - कृष्णा आसवानी
इति - आकांशा सिंह भदौरिया
नवाज़ - डॉ. पुनीत चन्द्र
प्रोफेसर मदन - राहुल निमिया
मंच परे :-
परिकल्पना व निर्देशन
सरफ़राज़ हसन
मंच व्यवस्थापक - डॉ. पुनीत चंद्र
मंच परिकल्पना - सिराज उल हसन भय्यू
मंच निर्माण : गौतम लोधी
मंच साम्रगी - सपना पवार
वेशभूषा - सना शाहिद
रूपसज्जा - सीमा राय
प्रकाश परिकल्पना
व संचालन - गौतम लोधी
संगीत संचालन - धीरज सिंह
डिजाइनिंग, प्रचार प्रसार - अमन अग्रवाल
वीडियोग्राफी/फ़ोटो - जयदीप


