निजी समितियों व बिल्डरों के अधीन जल प्रबंधन, शिकायत व्यवस्था और दंड प्रावधानों की आवश्यकता
भोपाल l शहरों की आवासीय कॉलोनियों में स्वच्छ पेयजल नागरिकों का मूल अधिकार है, किंतु अनेक क्षेत्रों में जल आपूर्ति और पानी की टंकियों का संचालन निजी रहवासी समितियों के अधीन है। कई स्थानों पर समिति अध्यक्षों की लापरवाही के चलते जल की गुणवत्ता, टंकी की नियमित सफाई और स्वास्थ्य मानकों की अनदेखी आम बात बन चुकी है, जिसका सीधा और गंभीर प्रभाव आम नागरिकों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
हाल ही में मध्यप्रदेश के इंदौर के भागीरथ मोहल्ला क्षेत्र में दूषित पानी पीने से 17 लोगों की मृत्यु की दर्दनाक घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया। यह घटना केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चेतावनी है कि यदि जल प्रबंधन में लापरवाही इसी तरह जारी रही, तो ऐसी घटनाएं किसी भी कॉलोनी या सोसायटी में दोहराई जा सकती हैं।
नगर निगम आयुक्त एवं जिला कलेक्टर को इस विषय का गंभीर संज्ञान लेते हुए निजी रहवासी समितियों के साथ-साथ उन बिल्डरों के लिए भी स्पष्ट, सख्त और बाध्यकारी दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए, जिनके पास आज भी सोसायटी का संपूर्ण या आंशिक प्रबंधन नियंत्रण बना हुआ है। इन दिशा-निर्देशों में पानी की टंकी की अनिवार्य सफाई की समय-सीमा, जल गुणवत्ता की नियमित जांच, जांच रिपोर्ट का सार्वजनिक प्रदर्शन तथा उसका लिखित और डिजिटल रिकॉर्ड अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए।
एक गंभीर व्यावहारिक समस्या यह भी सामने आ रही है कि जिन क्षेत्रों में नगर निगम स्वयं जल आपूर्ति नहीं करता, वहां के रहवासी जब दूषित पानी या टंकी की सफाई से संबंधित शिकायत दर्ज कराना चाहते हैं, तो उनकी शिकायत नगर निगम या सीएम हेल्पलाइन में यह कहकर दर्ज नहीं की जाती कि पानी की आपूर्ति निजी समिति या बिल्डर द्वारा की जा रही है। यह स्थिति तब और अधिक असंगत प्रतीत होती है, जब वही रहवासी भोपाल नगर निगम की सीमा के अंतर्गत निवास करते हैं और नियमित रूप से प्रॉपर्टी टैक्स, स्वच्छता शुल्क सहित अन्य नगर निगम करों का भुगतान भी करते हैं।
ऐसे में यह आवश्यक है कि नगर निगम एक स्पष्ट नीति बनाए, जिसके तहत यदि कोई रहवासी नगर निगम सीमा में आता है और कर व शुल्क अदा करता है, तो उसकी शिकायत नगर निगम एवं सीएम हेल्पलाइन में अनिवार्य रूप से दर्ज की जाए, चाहे जल आपूर्ति निजी समिति या बिल्डर के माध्यम से ही क्यों न हो। शिकायत दर्ज न होना प्रशासनिक जिम्मेदारी से बचने जैसा प्रतीत होता है, जिसका सीधा नुकसान आम नागरिकों को उठाना पड़ता है।
साथ ही यह भी अनिवार्य किया जाना चाहिए कि यदि किसी निजी सोसायटी या बिल्डर की लापरवाही के कारण जल दूषित होता है और उससे नागरिकों के स्वास्थ्य या जीवन को क्षति पहुंचती है, तो रहवासी समिति के अध्यक्ष के साथ-साथ संबंधित बिल्डर पर भी दंडात्मक कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान हो। इसमें आर्थिक दंड, लाइसेंस निरस्तीकरण, प्रबंधन से हटाने की कार्रवाई तथा गंभीर मामलों में आपराधिक प्रकरण दर्ज करने जैसे प्रावधान शामिल किए जाने चाहिए, ताकि जिम्मेदारी तय हो सके और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
नगर निगम द्वारा समय-समय पर निरीक्षण, जल ऑडिट और शिकायत निवारण व्यवस्था को प्रभावी बनाना भी आवश्यक है, ताकि निजी समितियों और बिल्डरों के अधीन जल प्रबंधन व्यवस्था मनमानी का शिकार न बने और नागरिकों को सुरक्षित व स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो सके।
— वरिष्ठ पत्रकार
नितिन कुमार गुप्ता



