भोपाल। कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो जमकर वायरल हुआ था जिसमें एक महिला अपनी बच्चियों के साथ पालकी में बैठी हुई है और बैकग्राउंड में "पालकी में होकर सवार चली रे".... गीत बज रहा है। जब वीडियो को देखा तो उसमें तात्कालीन सिवनी कलेक्टर संस्कृति जैन अपनी दोनों बेटियों संग पालकी में बैठी हुई थी । अधिकारी - कर्मचारी और आमजन उन पर फूलों की बारिश कर रहे थे और जनता उन्हें नाम आंखों से भावुक विदाई दे रही थी । वह क्षण बहुत  ही भावुक कर देने वाला था । दरअसल सिवनी कलेक्टर रहीं संस्कृति जैन का तबादला भोपाल नगर निगम कमिश्नर के पद पर हुआ था और यह उनकी विदाई के समय का ही दृश्य था । यह विदाई समारोह चर्चा का विषय बन गया था। सिवनी कलेक्टर के रूप में संस्कृति जैन का अधिकारियों -कर्मचारियों और आम जनता से सीधा जुड़ाव था । उन्होंने वहां के लोगों को एहसास कराया कि वे कोई वीवीआईपी नहीं हैं बल्कि उनके बीच की ,उनके जैसी ही हैं । उनकी इसी विशेषता ने उन्हें सबसे अलग बना दिया । सिवनी कलेक्टर के रूप में उन्होंने "गिफ्ट ए डेस्क" नामक नवाचार किया । अपनी सेवा के दौरान उन्होंने शिक्षा और बुनियादी ढांचे को विकसित करने पर जोर दिया । वहीं हरित सिवनी नामक अभियान चलाकर लगभग पांच लाख पेड़ लगवाए । उनके द्वारा प्राथमिक स्कूलों में डैक्स-बेंच गिफ्ट करने की योजना पूरे प्रदेश भर में चर्चा में का विषय रही थी। इसके पहले संस्कृति जैन मऊगंज एसडीएम ,सतना एडीएम, अलीराजपुर और नर्मदापुरम सीईओ जिला पंचायत  तथा रीवा नगर निगम कमिश्नर और बालाघाट कलेक्टर भी रहीं। वे सीधे जनता के साथ जुड़कर स्थानीय स्तर पर काम करने के लिए जानी जाती हैं । प्रसन्नचित मन के साथ वह हमेशा काम करती हैं और रही अनुशासन की बात तो उनके माता और पिता दोनों ही इंडियन एयरफोर्स में थे, तो अनुशासन की सीख उन्हें बचपन से ही, परिवार में ही मिल गई थी । वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान हैं। हमेशा कुछ नया सीखने की कोशिश करने वाली भोपाल नगर निगम कमिश्नर संस्कृति जैन कहती हैं कि वह जो कुछ भी हैं, माता-पिता की वजह से ही हैं। लक और माता-पिता ने हमेशा उनका साथ दिया है। वे हमेशा फ्रंट फुट पर खेलना पसंद करती हैं, काम कोई भी हो वह उसे डिवोशन और डेडीकेशन के साथ करना पसंद करती हैं। यूपीएससी में दूसरी बार में ही उनका चयन आईआरएस के लिए हुआ था और उन्होंने इनकम टैक्स में भी काम किया है। वह कहती हैं कि विकिपीडिया मेरा बेस्ट फ्रेंड है और जो मुझे नहीं पता होता है वह मैं गूगल से पता करती हूं, 2015 बैच की आईएएस अफसर संस्कृति जैन ने 2014 में यूपीएससी परीक्षा में 11वीं रैंक हासिल की थी । उनकी यूपीएससी की कहानी न केवल प्रेरणादायी है बल्कि हर एक युवा के अंदर कुछ करने की चाह भी जगाती है । भोपाल नगर निगम कमिश्नर के रूप में भी वे उस समय चर्चा में आ गई थी । जब उन्होंने लापरवाह इंजीनियर्स को अनोखी सजा सुनाई थी । लगभग 75 असिस्टेंट और सबइंजीनियर्स को उन्होंने विशेष सजा सुनाते हुए उन्हें बूथ लेवल ऑफिसर बीएलओ का सहायक बना दिया था। उनका मानना है कि उन्हें भाग्य ने सब कुछ अच्छा दिया है, बस अब उनकी इच्छा है कि उनकी दोनों जुड़वा बेटियां भी बेहतर इंसान बनें । पति के बारे में वे  कहती हैं कि वह बहुत बैलेंसिंग परसन हैं और कम बोलना उनके व्यक्तित्व की विशेषता है और यह मुझे उनसे सीखना पड़ रहा है । उनके पति आईपीएस अफसर हैं, जो वर्तमान में रायसेन जिले में पुलिस अधीक्षक के पद पर कार्यरत हैं। भोपाल नगर निगम कमिश्नर संस्कृति जैन का सपना है कि भोपाल स्वच्छता में नंबर वन बनें और इसी दिशा में वे निरंतर प्रयास भी कर रही है।      वरिष्ठ पत्रकार तेजेंद्र भार्गव ने उनसे लंबी चर्चा की । प्रस्तुत हैं उस साक्षात्कार के मुख्य अंश...             ​सवाल : आपने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) को ही क्यों चुना?
जबाव : मेरा मानना है कि आईएएस एक ऐसा मंच है जहाँ आप नीति निर्धारण (Policy making) और धरातल पर क्रियान्वयन (Execution) के बीच की कड़ी बनते हैं। सीधे तौर पर लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने और समाज के अंतिम व्यक्ति की सेवा करने का जो अवसर यह सेवा देती है, वह अद्वितीय है।
​सवाल : कलेक्टर से भोपाल नगर निगम कमिश्नर बनने तक का सफर कैसा रहा? कामकाज में क्या बदलाव नजर आ रहा है?
जबाव : सफर चुनौतीपूर्ण और सीखने वाला रहा है। एक जिले के कलेक्टर के रूप में जिम्मेदारी व्यापक होती है, लेकिन नगर निगम कमिश्नर के तौर पर ध्यान 'अर्बन गवर्नेंस' और नागरिक सुविधाओं पर केंद्रित होता है। यहाँ काम की गति (Pace) बहुत तेज है। आज तकनीक के माध्यम से हम सेवाओं को अधिक पारदर्शी और रिस्पांसिबल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
​सवाल : भोपाल को स्वच्छता में नंबर वन बनाने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं?
जबाव : हमारा पूरा ध्यान 'सोर्स सेग्रीगेशन' (कूड़े को घर पर ही अलग करना) और 'जीरो वेस्ट' मॉडल पर है। हम कचरा प्रसंस्करण (Processing) की क्षमता बढ़ा रहे हैं और सफाई मित्रों की सुरक्षा व आधुनिक मशीनों के उपयोग पर जोर दे रहे हैं। भोपाल की भौगोलिक सुंदरता को बनाए रखते हुए हम जन-भागीदारी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना रहे हैं।
​सवाल : वार्ड प्रभारी शिकायतों को गंभीरता से नहीं सुनते, सीएम हेल्पलाइन के बाद ही सक्रियता क्यों?
उत्तर: यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है, लेकिन हम सुधार की गुंजाइश से इनकार नहीं करते। हमारा प्रयास है कि विकेंद्रीकृत प्रणाली (Decentralized system) इतनी मजबूत हो कि शिकायत सीएम हेल्पलाइन तक पहुंचे ही न। हम वार्ड स्तर पर जवाबदेही तय कर रहे हैं और 'फीडबैक लूप' को कड़ा कर रहे हैं ताकि टालने वाला रवैया खत्म हो।
​सवाल : भोपाल को स्वच्छ बनाने के लिए आम लोगों से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं?
जबाव : मेरी बस एक ही अपेक्षा है—'अपनापन'। भोपाल आपका है। कचरा सड़क पर न फेंकें, सूखे और गीले कचरे को अलग-अलग दें और प्लास्टिक का उपयोग कम करें। जब हर नागरिक भोपाल को अपना घर समझेगा, तो स्वच्छता स्वाभाविक हो जाएगी।
​सवाल : कागजों में दिखने वाले कर्मचारियों और उनकी पड़ताल पर आपका क्या कहना है?
जबाव : निगम की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए हम बायोमेट्रिक हाजिरी और फील्ड स्टाफ की जियो-टैगिंग पर काम कर रहे हैं। जो कर्मचारी निष्ठा से काम नहीं कर रहे हैं या अनुपस्थित रहते हैं, उन पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। जनता के टैक्स का पैसा केवल वास्तविक कार्य के लिए ही उपयोग होगा, इसकी पड़ताल लगातार जारी है।
​सवाल : आपके दृष्टिकोण से सफलता का मूल मंत्र क्या है?
जबाव : मेरे लिए सफलता का मंत्र है—निरंतरता और ईमानदारी (Consistency and Integrity)। यदि आप अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार हैं और छोटी-छोटी असफलताओं से डरे बिना लगातार प्रयास करते हैं, तो सफलता निश्चित है।
​सवाल : आपके नजरिए से कर्म के साथ-साथ भाग्य का साथ मिलना कितना जरूरी है?
जबाव : मैं कर्म प्रधानता में विश्वास रखती हूँ। भाग्य अक्सर उन्हीं का साथ देता है जो मेहनत करने का साहस रखते हैं। सफलता = कठिन परिश्रम + सही अवसर। अवसर को ही लोग अक्सर भाग्य कहते हैं, लेकिन उस अवसर को भुनाने के लिए आपकी तैयारी (कर्म) पहले से होनी चाहिए।
​सवाल : अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आप महिलाओं को क्या संदेश देना चाहेंगी?
जबाव : मेरा संदेश केवल महिलाओं को नहीं, बल्कि पूरे समाज को है। एक महिला तभी अपनी पूरी क्षमता से काम कर सकती है जब उसे घर और समाज में सहायक माहौल मिले। हमें महिलाओं का 'मानसिक बोझ' (Mental Load) कम करना होगा। जब घरेलू जिम्मेदारियां साझा होंगी, तभी महिलाएं 'ग्लास सीलिंग' तोड़कर नेतृत्व कर पाएंगी। आइए, एक ऐसा सशक्त वातावरण बनाएं जहाँ आने वाले समय में हमें अलग से महिला दिवस मनाने की जरूरत ही न पड़े।