क्रेडिट कार्ड के मकड़जाल में फसती जिंदगियां, आखिर कब रुकेगी यह आर्थिक प्रताड़ना...?
इंदौर में एक डिलीवरी बॉय द्वारा कथित रूप से क्रेडिट कार्ड का कर्ज नहीं चुका पाने के तनाव में आत्महत्या कर लेने की घटना बेहद दुखद और चिंताजनक है। यह घटना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि देश में बढ़ते क्रेडिट कार्ड कर्ज, भारी ब्याज दरों और वसूली के अमानवीय तरीकों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
आज अधिकांश बैंक और वित्तीय संस्थान लोगों को आसानी से क्रेडिट कार्ड उपलब्ध करा रहे हैं। फोन कॉल, मैसेज और आकर्षक ऑफर देकर लोगों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि क्रेडिट कार्ड आर्थिक जरूरतों का आसान समाधान है। लेकिन जब कोई व्यक्ति समय पर भुगतान नहीं कर पाता, तब उसके सामने ऐसी परिस्थितियाँ खड़ी कर दी जाती हैं, जिनसे निकलना बेहद कठिन हो जाता है।
36 से 48 प्रतिशत तक सालाना ब्याज
क्रेडिट कार्ड पर बकाया राशि पर कई बैंक और कार्ड कंपनियां लगभग 36 से 48 प्रतिशत तक सालाना ब्याज वसूलती हैं। इसके अलावा –
लगभग ₹500 तक लेट पेमेंट फीस,
₹500 से ₹1,000 तक ओवर लिमिट चार्ज,
जीएसटी और अन्य शुल्क
लगाकर बकाया राशि को लगातार बढ़ाया जाता है। कई बार कुछ हजार रुपये का कर्ज कुछ महीनों में कई गुना हो जाता है।
वसूली एजेंटों की धमकी और अभद्र व्यवहार
जब उपभोक्ता भुगतान नहीं कर पाता, तब कई मामलों में रिकवरी एजेंट गाली-गलौज, अपमानजनक भाषा और कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर मानसिक दबाव बनाते हैं। लगातार फोन कॉल, रिश्तेदारों और परिचितों को फोन करना, सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की धमकी देना जैसी शिकायतें भी सामने आती रहती हैं।
ऐसी परिस्थितियां आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को मानसिक तनाव और अवसाद की ओर धकेल देती हैं।
तहसील कार्यालय के माध्यम से बैंक खाते होल्ड करने की शिकायतें
कई उपभोक्ताओं की शिकायत है कि कुछ मामलों में रिकवरी एजेंटों द्वारा तहसील कार्यालय के माध्यम से बैंक खाते होल्ड कराने की कार्रवाई की जाती है। आरोप यह भी लगते रहे हैं कि कई बार संबंधित व्यक्ति को उचित सुनवाई का अवसर दिए बिना खाते फ्रीज कर दिए जाते हैं और नोटिस मिलने के बाद भी तहसीलदार से मिलने का अवसर नहीं मिलता।
यदि किसी व्यक्ति पर अत्यधिक ब्याज और शुल्क लगाकर वसूली की जा रही हो, तो बिना उचित जांच-पड़ताल के प्रशासनिक तंत्र का उपयोग कर बैंक खाते होल्ड करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। किसी भी नागरिक को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन होना चाहिए।
डेटा चोरी और अनचाहे क्रेडिट कार्ड ऑफर
आजकल सुपर मार्केट, पेट्रोल पंप और विभिन्न व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर लोगों की व्यक्तिगत जानकारी एकत्र होने के बाद उन्हें बार-बार फोन कर क्रेडिट कार्ड लेने के लिए प्रलोभन दिया जाता है। कई लोग यह सवाल उठाते हैं कि आखिर उनका मोबाइल नंबर और व्यक्तिगत जानकारी वित्तीय कंपनियों तक कैसे पहुंच रही है?
डेटा सुरक्षा की कमी और आक्रामक मार्केटिंग के कारण बड़ी संख्या में लोग बिना पर्याप्त जानकारी के क्रेडिट कार्ड ले लेते हैं और बाद में कर्ज के जाल में फंस जाते हैं।
सरकार और नियामकों को करना होगा हस्तक्षेप
यह समय है कि सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक और संबंधित नियामक संस्थाएं निम्न बिंदुओं पर गंभीरता से विचार करें –
क्रेडिट कार्ड ब्याज दरों पर सीमा तय की जाए।
अत्यधिक लेट फीस और ओवर लिमिट चार्ज पर नियंत्रण हो।
रिकवरी एजेंटों द्वारा अभद्र व्यवहार पर सख्त कार्रवाई हो।
बैंक खाता होल्ड करने से पहले उपभोक्ता को सुनवाई का पूरा अवसर दिया जाए।
डेटा चोरी और अनचाहे मार्केटिंग कॉल पर कड़ी निगरानी रखी जाए।
वित्तीय साक्षरता बढ़ाई जाए ताकि लोग कर्ज लेने से पहले उसके जोखिम को समझ सकें।
इंदौर की यह दुखद घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आर्थिक कठिनाई से जूझ रहे व्यक्ति को सहारा देने के बजाय यदि व्यवस्था उसे और अधिक दबाव में डाल दे, तो इसके परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं। किसी भी कर्ज की वसूली इंसान की गरिमा और जीवन से बड़ी नहीं हो सकती। समाज, बैंकिंग व्यवस्था और प्रशासन को मिलकर ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना होगा।


