संस्मरण-

रायसेन के जिला भाजपा नेतृत्व से सीख ले केंद्रीय नेतृत्व

जब फूलों ने टकराव रोक दिया...
हरीश मिश्र ( 9584815781 )

 कुछ तिथियाँ पंचांग से आगे निकलकर स्मृतियों में स्थायी हो जाती हैं। मेरे लिए 22 फरवरी 2026 ऐसी ही एक तिथि है।
    यूजीसी काला कानून के विरोध में सवर्ण समाज ने रायसेन में भाजपा कार्यालय पर "बच्चे जमा करो आंदोलन" का आह्वान किया था। आक्रोशित समाज ने निर्णय लिया कि विरोध का ज्ञापन जिला प्रशासन को नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल के स्थानीय कार्यालय में जाकर दिया जाएगा। संदेश स्पष्ट था...जब निर्णय सत्ता के स्तर पर लिया गया है, तो विरोध की आवाज़ भी सत्ता तक ही पहुँचे।
     इस आंदोलन को सफल बनाने की जिम्मेदारी मेरे साथ भारत सिंह राजपूत, संघर्ष शर्मा, सूर्य प्रकाश सक्सेना, प्रवीण मिश्र, दीपक ठाकुर, श्याम अग्रवाल, राजेन्द्र दुबे "सोमवार" अशोक श्रीवास्तव, राजकुमार दुबे, संदीप दुबे 
के कंधों पर थी। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती भीड़ जुटाना नहीं थी, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहे। मन में बार-बार एक ही चिंता उठती थी "कहीं हमारे बच्चों पर पुलिस की लाठियाँ न बरसें, कहीं कोई अराजक तत्व आंदोलन को हिंसक न बना दे और कहीं कोई ऐसा व्यक्ति माहौल खराब न कर दे, जो टकराव चाहता हो। " ऐसे तत्व हर आंदोलन में सक्रिय होने का प्रयास करते हैं।
इन्हीं आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए आंदोलन की रणनीति कई बार बनाई गई और परिस्थितियों के अनुसार बदली भी गई। प्रत्येक वक्ता और कार्यकर्ता को संयम, अनुशासन और धैर्य का संदेश दिया गया। स्पष्ट निर्देश था कि आंदोलन का उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखना है।
      जैसे-जैसे 22 फरवरी निकट आती गई, सामाजिक और राजनीतिक वातावरण गर्म होता गया। पुलिस प्रशासन लगातार संपर्क में था। उसकी चिंता कानून-व्यवस्था को लेकर थी। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष से संवाद लगभग न के बराबर था। ऐसे में टकराव की आशंका स्वाभाविक थी।
     लेकिन 21 फरवरी की रात  भाजपा जिलाध्यक्ष राकेश शर्मा ने एक ऐसा निर्णय लिया, जिसने पूरे घटनाक्रम की दिशा बदल दी। भाजपा कार्यालय के सामने टेंट लगाया गया और निर्णय हुआ कि विरोध करने आ रहे सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों का प्रतिरोध नहीं, बल्कि पुष्पवर्षा कर स्वागत किया जाएगा। उनके लिए शीतल जल और जलपान की भी व्यवस्था की जाएगी।
     22 फरवरी को ऐतिहासिक प्रदर्शन हुआ। जब हजारों आंदोलनकारी भाजपा कार्यालय , रायसेन पहुँचे, तब जिला अध्यक्ष राकेश शर्मा, मंडल अध्यक्ष आदित्य शर्मा, बबलू ठाकुर और रम्मू तोमर सहित स्थानीय नेतृत्व ने पुष्पवर्षा कर  स्वागत किया, गले लगाया और सम्मानपूर्वक हमारी बात सुनी।
    उस क्षण लगा कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संवाद, सम्मान और संवेदनशीलता में निहित है। संभावित टकराव समाप्त हो गया। आंदोलन सफल रहा, संदेश भी पहुँचा और सबसे महत्वपूर्ण बात...कोई अप्रिय घटना नहीं हुई।    
आंदोलन अपनी गरिमा और अनुशासन बनाए रखने में पूरी तरह सफल रहा।
     आज जब देश में छात्र जंतर-मंतर से संसद तक अपनी माँगों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं, तब रायसेन की यह घटना सहज ही स्मरण हो आती है। यदि विरोध कर रहे युवाओं को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि लोकतंत्र के सहभागी मानकर उनकी बात सुनी जाए, उन पर लाठियाँ चलाने के बजाय संवाद और सम्मान का मार्ग अपनाया जाए, तो अनेक तनावपूर्ण परिस्थितियों से बचा जा सकता है।
     रायसेन की उस घटना ने मुझे सिखाया कि सफल आंदोलन केवल भीड़ से नहीं, बल्कि संयम, अनुशासन, दूरदृष्टि और संवाद से सफल होते हैं। कभी-कभी फूलों की शक्ति, लाठियों से कहीं अधिक प्रभावशाली सिद्ध होती है।
     मेरा मानना है कि रायसेन के जिला नेतृत्व द्वारा उस समय अपनाया गया संवाद और सम्मान का मार्ग लोकतांत्रिक दृष्टि से एक सकारात्मक उदाहरण था। ऐसे अनुभव व्यापक राजनीतिक नेतृत्व के लिए भी विचारणीय हो सकते हैं कि मतभेदों के बीच संवाद और सम्मान तनाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

भाजपा राष्ट्रीय नेतृत्व को जिला नेतृत्व से प्रेरणा लेना चाहिए। आंदोलनकारी सदैव आक्रोश में होते हैं भीड़ जोड़ने पर नेतृत्व दिशाहीन हो जाता है तोड़-फोड़ ,आगजनी जैसी घटनाएं होती हैं... यदि सरकार समय रहते आंदोलनकारी से बात कर लेती है तो समस्याओं का समाधान हो जाता है। 

20 जुलाई को जब छात्र जंतर मंतर से संसद तक पहुंचे तो सरकार यदि सम्मानपूर्वक संवाद करती तो रास्ता भी निकलता और लोकतंत्र मजबूत होता।

लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )