दिव्य चिंतन 

"ठंड मौसम नहीं, समाज की परीक्षा है"             रायसेन जिला विकास समिति द्वारा पठारी टोला गांव में ऊनी वस्त्र वितरण

हरीश मिश्र 

रायसेन जिला मुख्यालय से मात्र छह किलोमीटर दूर  पठारी,  पत्थरों का वह गांव, जहां धरती का सीना चीरकर मजदूरों ने  छैनी-हथौड़े की चोट से कई राजनेताओं, ठेकेदारों की तकदीर बदल दी, पर जिन हाथों ने पत्थर तोड़े, उनकी तक़दीर वहीं ठिठकी रह गई। तस्वीरें बदलीं,उनकी नहीं। आज भी उनके हिस्से न छत है, न कपड़ा; खुला आसमान है और ठंड में कांपते बच्चे।
ठंड  मौसम नहीं, प्रश्न है। ठंड यह पूछती है—समाज के पास संवेदना कितनी बची है ? क्या वह केवल शब्दों में है, या व्यवहार में भी ? इसी प्रश्न के उत्तर में बस एक कदम और बढ़ाया सामाजिक कार्यकर्ताओं ने... हाथ से हाथ जुड़े, कारवाँ आगे बढ़ा। कभी कदम-कदम पर कदंब वृक्ष रोपे गए थे, आज उसी परंपरा की निरंतरता में बस एक कदम और सोशल वेलफेयर फाउंडेशन और रायसेन जिला विकास समिति के सदस्य पठारी टोला पहुँचे। वहां कोई मंच नहीं था, न भाषणों की गूंज—था तो सिर्फ़ इंसान और इंसान के बीच का रिश्ता।
जब ऊनी वस्त्र नन्हे बच्चों को भेंट किए गए, तब वह केवल ठंड से बचाव नहीं था। वह उस स्वीकार का क्षण था कि समाज की जिम्मेदारी संवेदना से शुरू होती है। जिस समाज में संवेदना आख़िरी व्यक्ति तक नहीं पहुंचती, वहाँ दर्शन पुस्तकालयों में बंद होकर रह जाता है। पठारी टोला ने यह भ्रम तोड़ दिया कि नैतिकता किसी ऊंचे विचारलोक में रहती है—वह तो ज़मीन पर, ठंडी मिट्टी पर खड़े होकर अपना अर्थ पाती है।
यह दृश्य हमें एक और सत्य सिखाता है—देने और पाने की रेखा उतनी स्पष्ट नहीं होती, जितनी हम मान लेते हैं। आज जो दे रहा है, कल वही पाने की स्थिति में हो सकता है। इसलिए सहायता दया नहीं, बल्कि भविष्य के लिए किया गया पुण्य-निवेश है,जिसका लाभ भवांतर में भगवान देता है।
कोई भी समाज तब जीवित रहता है, जब वह अपनी हिस्सेदारी पहचानता है और जब वह इस जिम्मेदारी से  मुँह  मोड़ ले, तब चाहे प्रगति का कितना भी दावा कर ले—वह भीतर से ठंडा पड़ चुका होता है।
तो आइए, अपनी-अपनी जिम्मेदारी उठाएँ। कुछ कदम हम चलें, कुछ कदम तुम साथ चलो।
क्योंकि अंततः ठंड यही परखती है—कि समाज के पास कितनी आँच बची है: मन की, सोच की, और जिम्मेदारी की।