जीवित बेटी के श्राद्ध और शोक सभा का आयोजन कर दिया समाज को बड़ा संदेश
“जब खून से ज़्यादा मूल्यवान होता है संस्कार – ललितपुर की शोकसभा समाज के लिए एक चेतावनी है”
🔷 भूमिका
समय बदल रहा है, लेकिन मूल्य?
क्या वे भी बदल जाएँ?
क्या हर परिवर्तन प्रगति है?
क्या प्रेम का नाम लेकर मर्यादा की सारी सीमाएँ तोड़ दी जाएँ?
और यदि कोई परिवार, अपने मूल्यों की रक्षा के लिए कड़ा निर्णय लेता है — तो क्या वह निंदनीय है या प्रशंसनीय?
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🔷 प्रसंग: प्रेमी संग भागी बेटी से नाता तोड़ कर शोकसभा का आयोजन
ललितपुर (उ.प्र.) के एक जैन परिवार ने, जब उनकी बेटी ने प्रेमी के साथ भागकर शादी कर ली, तो समाज के सामने एक ऐतिहासिक और साहसी उदाहरण प्रस्तुत किया —
उन्होंने न केवल बेटी से नाता तोड़ दिया, बल्कि बाकायदा 12 अगस्त को “शोक सभा” रखकर यह संदेश दिया कि परिवार और समाज में ‘नैतिक मृत्यु’ को भी वास्तविक मृत्यु के समान समझा जाएगा।
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🔷 यह निर्णय क्यों सही है?
1. संस्कार रक्त संबंधों से ऊपर हैं
सिर्फ इसलिये कि कोई हमारी संतान है, हम उसके हर कृत्य को स्वीकार करें, यह सहानुभूति नहीं, संस्कारों का अपमान है।
अगर संतान सत्य, मर्यादा, और समाज की गरिमा को लांघती है, तो परिवार का यह कर्तव्य बन जाता है कि वह उससे नाता तोड़े।
2. प्रेम की आड़ में बढ़ती अराजकता का विरोध
आजकल “प्रेम विवाह” के नाम पर जो संस्कृति-विरोधी, मूल्य-विहीन और स्वेच्छाचारपूर्ण आचरण सामने आ रहा है — वह प्रेम नहीं, स्वार्थपूर्ण स्वतंत्रता की माँग है।
जो प्रेम, माँ-बाप की आँखों का पानी सुखा दे, बहन-भाइयों की इज्ज़त डुबा दे, वह प्रेम नहीं, पतन का द्वार है।
3. समाज को संदेश देना ज़रूरी था
आज अगर हम चुप रहें, तो अगली पीढ़ी और भी निर्लज्ज होकर अपने “अधिकारों” की दुहाई देगी, लेकिन “कर्तव्यों” की बात नहीं करेगी।
यह शोकसभा केवल एक बेटी की विदाई नहीं थी —
यह सांस्कृतिक स्खलन के खिलाफ़ समाज का बिगुल थी।
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🔷 आशंका नहीं, आवश्यकता है ऐसे निर्णयों की
• जब टीवी और मोबाइल बच्चों को सिखा रहे हैं कि “प्यार में सब जायज़ है”,
• जब वेब सीरीज़ में माँ-बाप को राक्षस और बॉयफ्रेंड को मसीहा दिखाया जा रहा है,
• जब मंदिर से भाग कर कोर्ट मैरिज को “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” कहा जा रहा है,
तब ऐसे निर्णय आवश्यक हैं — क्योंकि ये समाज को आईना दिखाते हैं।
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🔷 क्या यह कठोरता है? नहीं, यह करुणा है — समाज के लिए
परिवार ने जो किया, वह केवल एक व्यक्तिगत प्रतिक्रिया नहीं थी।
• वे बेटी को मार सकते थे, ऐसा नहीं किया।
• वे केस कर सकते थे, वह भी नहीं किया।
• उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा —
“अब यह हमारी बेटी नहीं रही। उसके लिए हमारा स्थान अब शून्य है। हम उसके लिए मृत हो चुके हैं।”
यह निर्णय उतना ही पीड़ादायक था, जितना साहसी।
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🔷 शोकसभा — एक सामाजिक घोषणा, एक आत्मघोषित मर्यादा रेखा
शोकसभा का आयोजन करके परिवार ने बहुत स्पष्ट और सख्त संदेश दिया:
“अगर हमारे संस्कारों की हत्या होगी, तो हम भी उसका दाह संस्कार करेंगे — भले वह हमारा ही खून क्यों न हो।”
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🔷 समाज के लिए संदेश
1. माता-पिता सिर्फ़ खर्च करने के लिए नहीं हैं, वे दिशा देने वाले स्तंभ हैं।
2. जिस दिन बच्चों की स्वतंत्रता, परिवार की प्रतिष्ठा से ऊपर हो गई — उस दिन घर, घर नहीं रहता।
3. अब समय आ गया है कि समाज ऐसे मामलों में खुलकर समर्थन करे — वरना मौन अपराध को बढ़ावा देगा।
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✅ निष्कर्ष
ललितपुर के इस परिवार का यह निर्णय आने वाली पीढ़ियों के लिए एक चेतावनी है —
कि
“संस्कारों को छोड़ कर किया गया प्रेम, न तो स्वीकार्य है, न क्षम्य।”
हम सबको इस कदम का समर्थन करना चाहिए, और ऐसे साहसी परिवारों को समाज में अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। ( sivi Jain की face book वाल से साभार)



