ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई काम एक लाभ अनेक

कटनी - कृषि विभाग द्वारा ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई के सम्बंध में बताया गया कि गहरी जुताई एक ऐसा काम है, जिसमें अनेक लाभ समाहित हैं। ग्रीष्मकालीन जुताई अप्रैल, मई माह से 10 जून तक की जाती है। इससे मृदा के बहुत से भौतिक गुणों में सुधार होता है। मृदा में जल की मात्रा तथा स्तर बढ़ता है, जो फसल को लंबे समय तक नमी प्रदान करता है। जड़ों की पूरी तरह वृद्धि होती है। रबी या जायद की फसलों पर लगे हुए हानिकारक कीटों के अंडे व लार्वा, जो जमीन की दरारों में छिपे होते हैं, मई-जून की तेज धूप से नष्ट हो जाते हैं। इससे खेत, कीट-पतंगों से सुरक्षित हो जाता है और अगली फसल में कीटों के हमले की आशंका कम हो जाती है। खरपतवार, फसल उत्पादन को लगभग 20-90 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं। ऐसा करने से मृदा का सूर्य ऊर्जा उपचार होता है, जिससे कीट व पौध रोगकारक नष्ट हो जाते हैं। जल का अपवाह रुकता है, खरपतवार नियंत्रण होता है और जड़ों की अच्छी वृद्धि होती है एवं उपज में लाभ (औसतन 10 प्रतिशत) होता है। कुछ बहुवर्षीय खरपतवार जैसे-कांस, मोथा, दूध आदि की जड़ें काफी गहराई तक जाती हैं। इनके नियंत्रण का एक कारगर उपाय ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई है। खरपतवारों की जड़ें, राइजोम आदि वानस्पतिक भाग ऊपरी सतह पर जो बाद में तेज गर्मी में सूखकर नष्ट हो जाते हैं। गर्मी की जुताई से खेत में मृदा के सुराख खुल जाने से बारिश का पानी गहराई तक पहुचता है जो मृदा की जल अवशोषण दर को बढ़ाता है। वहीं नमी काफी मात्रा में लंबे समय तक खेत में मौजूद रहती है। वायु तथा जल से होने वाले मृदा के कटाव को रोकने में मदद मिलती है। ग्रीष्मकालीन जुताई करने से बरसात के पानी द्वारा खेत की मृदा कटाव में भारी कमी होती है। गर्मी की गहरी जुताई करने से भूमि के कटाव में 66.5 प्रतिशत तक की कमी आती है। फलतः पोषक तत्वों का बहाव भी रोकता है। रबी फसलों में इस्तेमाल किए गए कीटनाशकों व खरपतवार नाशकों का अवशेष प्रभाव काफी लंबे समय तक रहता है। यह खरीफ में बुआई की जाने वाली फसल के अंकुरण व वृद्धि को प्रभावित कर सकता है। गर्मी में जुताई कर देने से खेत में उनका प्रभाव खत्म हो जाता है। तेज धूप से ये जहरीले रसायन विघटित हो जाते हैं और उनका खेत में असर नहीं रह जाता है। गहरी जुताई से फसल उत्पादन में भी वृद्धि होती है। गर्मी के समय में रबी व जायद की फसल कट जाने के बाद खेत की जुताई करने से फसल के अवशेष, डंठल व पत्तियां आदि मृदा में दब जाते हैं, जो बारिश के मौसम में सड़कर जमीन को जीवांश पदार्थ मुहैया करवाते हैं। खेत में इस्तेमाल किए गए रासायनिक उर्वरकों का काफी बड़ा हिस्सा (लगभग 50-65 प्रतिशत) अघुलनशील हालत में खेत में पड़ा रह जाता है। गर्मी की जुताई से सूर्य की तेज धूप से ये रसायन विघटित होकर घुलनशील उर्वरकों में बदल जाते हैं और अगली फसल को पोषण देते हैं। गहरी जुताई से प्रतिरोधक खरपतवार नष्ट हो जाते हैं ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई लगभग 9-12 इंच गहरी करनी चाहिए, गर्मी के समय में खेत की जुताई खेत की ढाल की विपरीत दिशा में करें। फसल की कटाई के बाद खेत में जुताई के लिए पर्याप्त नमी होनी चाहिए, अर्थात फसल कटाई के तुरंत बाद जुताई करें। इससे जुताई अच्छी तरह से होती है, ईंधन की खपत कम होती है ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करते समय खेत की मृदा के बड़े-बड़े ढेले बनाने चाहिए। इन ढेलों से वर्षा जल का अंतःसरण अधिक मात्रा में होता है, जिससे भूजल स्तर में भी वृद्धि होती है।