प्रभारी उपायुक्त की निष्पक्षता पर उठे सवाल..?

विदिशा सहकारी विपणन समिति में भ्रष्टाचार:
विदिशा - ( हरीश मिश्र, 9584815781 )
प्रेम चंद बारोठिया प्रभारी उप आयुक्त सहकारिता, विदिशा ने विदिशा सहकारी विपणन समिति, विदिशा के प्रभारी प्रबंधक चंदन सिंह रघुवंशी के भ्रष्टाचार एवं फर्जी प्रभारी प्रबंधक नियुक्ति की जांच हेतु सुनील अग्रवाल, उप अंकेक्षक को जांच अधिकारी नियुक्त किया था।
जांच अधिकारी को बिन्दु वार जांच कर, जांच प्रतिवेदन प्रेषित करना सुनिश्चित करना था। जांच अधिकारी ने प्रभारी प्रबंधक, विदिशा सहकारी विपणन समिति, के विरुद्ध जांच में गंभीर वित्तीय अनियमितताएं पाईं।
प्रभारी उप आयुक्त सहकारिता ने पहले अपने अधीनस्थ उप अंकेक्षक को जांच अधिकारी नियुक्त किया। फिर उस जांच के निष्कर्ष पर स्वहित में सवाल खड़े कर दिए कि शिकायत कर्ता ने जिन बिंदुओं की शिकायत की, जांच अधिकारी ने उन बिन्दुओं की विषय वस्तु से हटकर द्वेष पूर्ण भावना से, मनगढ़ंत तरीके से जांच कर प्रतिवेदन प्रस्तुत किया ।
जांच में संभावित परिस्थितियों, तथ्यों के अनुसार न्यायोचित निर्णय लेने के लिए विवेक की असीमित शक्ति संवैधानिक रुप से जांच अधिकारी को प्रदत्त की गई है।
सवाल तो प्रभारी उप आयुक्त सहकारिता के अंतिम समीक्षात्मक निर्णय पर खड़े हो रहे हैं। उप आयुक्त सहकारिता जानते हैं कि प्रभारी प्रबंधक के पास शैक्षणिक योग्यता नहीं थी तो यह प्रमाण पर्याप्त है कि जिस पद पर नियुक्ति ही विधि विरुद्ध हो, उस पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा लिए गए आर्थिक निर्णय स्वत: अवैध हो जाते हैं।
यदि जांच अधिकारी ने शिकायतकर्ता की शिकायत बिंदु से बाहर जाकर भ्रष्टाचार उजागर किया तो गलत क्या किया? क्या भ्रष्टाचार उजागर करना विधि विरुद्ध कृत्य है?
यदि इस जांच-जांच के खेल का परीक्षण किया जाए तो सच उजागर होता है कि प्रभारी प्रबंधक ने जांच के निष्कर्ष को लंबित रखने के लिए उप पंजीयक सहकारिता को साध लिया है। सहकारिता में यही होता है कि कोई भी प्रेमानंद प्रेम से वित्तीय अनियमितता करने वाले को चंदन का टीका लगा कर बेदाग साबित कर देता है।