(हरीश मिश्र)

किसी शिक्षक के दामन पर कलम की स्याही फेंकना हमारा उद्देश्य नहीं है। लेकिन कलम की स्याही उन शिक्षकों को बेनकाब कर रही है, जिनके दामन दागदार हैं। हमारी कलम सरकार की असफलताओं और व्यवस्था पर सवाल उठा रही है।

    कुछ "कामचोर शिक्षक," शिक्षा के मंदिरों में खलनायक बन गए हैं, और उनके दामन के दाग़ उजागर करना हमारा कर्तव्य है। *यह सत्य है कि सरकारी विद्यालयों में भी अच्छे शिक्षक हैं, लेकिन उनकी संख्या बेहद कम है।

    शिक्षक का धर्म और कर्तव्य है कि वह बच्चों को शिक्षित करें। विद्यालय केवल ज्ञान प्रदान करने वाले संस्थान नहीं हैं, बल्कि यह राष्ट्र निर्माण और व्यक्ति निर्माण की प्रयोगशालाएँ हैं।
लेकिन इन विद्यालयों में कार्यरत 70-80 हजार रुपये का वेतन पाने वाले अद्भुत, आलसी योद्धा, अपने राजनैतिक क्षत्रपों की चरण-वंदना कर और आशीर्वचन के बदले कलेक्ट्रेट, जिला पंचायत, तहसील, अनुविभागीय कार्यालय, निर्वाचन, शिक्षा विभाग या सर्वाधिक भ्रष्ट अभियान, सर्व शिक्षा अभियान, में संलग्न हो जाते हैं। कुछ ई-दक्षता में प्रशिक्षण ही लेते रहते हैं। जिन पर जिला पंचायत और शिक्षा विभाग के अधिकारियों की कृपा हो रही है, वे मदमस्त  हैं।*

     कुछ बीएलओ बन सड़कों पर हौले-हौले  डोलते नज़र आते हैं, कुछ मध्यान्ह भोजन प्रभारी बन बच्चों के हिस्से का भोजन खा रहे हैं। कुछ छात्रावास में कंबल ओढ़ कर घी पी रहे हैं। कुछ शासकीय आयोजन में महीनों तक नृत्य-संगीत में सहभागी बन, कक्षाओं से नदारद रहते हैं। कुछ स्वतंत्रता दिवस , गणतंत्र दिवस पर  हर बार सम्मानित होते रहते हैं, कुछ  सोशल मीडिया पर विद्यालय चला रहे हैं। कुछ गुड़ की गजक खा रहे हैं, कुछ भाजपा के लिए जी रहे हैं, तो कुछ नगर पालिका अध्यक्ष के कक्ष में जबरन सेवा दे रहे हैं और उन्होंने विद्यालय कोली पर दे रखा  है । ये खल"नायक" शिक्षक शिक्षा व्यवस्था को खोखला कर रहे हैं, बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं और अधिकारी मौन हैं।

     प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च  माध्यमिक विद्यालयों, उत्कृष्ट विद्यालयों और सीएम राइस विद्यालयों में कई खल"नायक" पदस्थ हैं, जो आंख मूंदकर सरकार से  धन ऐश्वर्य प्राप्त कर शिक्षा के क्षेत्र में भद्पीटवा रहे हैं।
     मंत्री, नेताओं और अधिकारियों की चापलूसी करना इन खल"नायकों" का मुख्य उद्देश्य बन गया है।

    शिक्षक, जिन्हें राष्ट्र निर्माता माना जाता है, जब नैतिक पतन का शिकार हो जाते हैं, तो वे विद्यालयों को अपवित्र कर देते हैं। जहां शिक्षक का उद्देश्य ज्ञान देना होना चाहिए, वहीं अब यह एक लाभ का धंधा बन गया है।
भ्रष्टाचार का निषिद्ध फल जिस शिक्षक ने चख लिया वह उसे खाना नहीं छोड़ रहा। सत्य की शिक्षा में धन एक अनिवार्य बुराई हो गई है और शिक्षक धन वसूलने वाले तांत्रिक हो गए हैं। मोटी पगार लेने वाले ये शिक्षक छात्रों का भविष्य खराब कर रहे हैं।

   शिक्षा के मंदिरों में कार्यरत खल"नायकों" का प्रभाव छात्रों के चरित्र और नैतिकता पर भी पड़ रहा है। जब शिक्षक और संस्थान खुद ही गलत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, तो छात्र भी नैतिक मूल्यों को नज़रअंदाज करना सीखते हैं।

    इस समस्या का समाधान केवल व्यवस्था में सुधार और नैतिक जागरूकता के माध्यम से हो सकता है। अभी भी वार्षिक परीक्षा में एक माह शेष है, इन कामचोर खलनायक शिक्षकों को स्कूल भेजा जाना चाहिए। इससे परीक्षा परिणाम सुधर सकता है।

लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )