109 वी जयंती पर कलम के सिपाही को नमन – विजयदत्त श्रीधर

श्रमजीवी पत्रकार गृह निर्माण सहकारी संस्था भोपाल आज कृती व्रतो भाई रतन कुमार की कीर्ति रक्षा का यत्किंचित उद्योग कर कलम के सिपाही को प्रणाम करने का सौभाग्य प्राप्त होने पर गौरव का अनुभव कर रही है। भाई साहब ने अपने संघर्षमय जीवन में भोपाल अंचल को पत्रकारिता, साहित्य, हिन्दी सेवा, स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय आन्दोलन आदि विविध क्षेत्रों में जो यशस्वी अवदान दिया, उसके दृष्टिगत उनका समुचित स्मारक खड़ा करने के लिए समाज को आगे आना चाहिए था, किन्तु उदासीनता को ही दोष दें कि अभी तक ऐसा नहीं हो सका था। हमारी संस्था के संचालक मण्डल ने एक मत से यह बीड़ा उठाया, पत्रकार नगर में सांस्कृतिक, शैक्षणिक, सामुदायिक गतिविधियों के केन्द्र के रूप में एक बहुउद्देश्यीय भवन का निर्माण होने पर यह निर्णय लिया गया कि इसका नामकरण ‘भाई रतन कुमार भवन’ किया जाए। इस निमित्त से हम सब उनके कृतित्व, संघर्ष, सोच और समाजसेवा के साथ जुड़ी भावनाओं, मूल्यों और आदशों का भी सायास स्मरण कर सकेंगे, प्रेरणा का एक दीपक प्रज्वलित कर पाएंगे। उनके ऋण से उऋण होने की बात तो सोचो भी नहीं जा सकती, परन्तु श्रद्धा के सुमन अर्पित कर आशीर्वाद और पथ प्रदर्शन की कामना तो की ही जा सकती है, राजधानी के प्रबुद्ध वर्ग की ओर से हम आज यही करने जा रहे हैं।
भोपाल के सार्वजनिक जीवन के एक अग्रणी हस्ताक्षर प्रो. अक्षय कुमार अक्सर भाई रतन कुमार को ‘जिन्दा शहीद’ सम्बोधित करते रहे हैं. लगभग 77 वर्ष के जीवन काल में से भाई साहब ने छह दशक का लम्बा अरसा समाज की बहुविधि सेवा में अर्पित किया। भोपाल में हिंदी का प्रचार प्रसार हो अथवा साहित्यिक वातावरण का निर्माण, मनीषियों की सुहृद गोष्ठी के आयोजन हों या कि स्थानीय प्रतिभाओं का प्रोन्नयन और विकास, हिन्दी पत्रकारिता का समारंभ और तेजस्वी पत्रों का सम्पादन, भोपाल रियासत के भारत संघ में विलय के लिए चला विलीनीकरण आंदोलन, ऐसे हर महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मोड़ पर हम भाई रतन कुमार को पहली कतार में खड़ा पाते हैं, बहुधा सबसे आगे। एक श्रेष्ठ शिक्षक भी वे रहे हैं। समाज के लिए बहुत कुछ करने वाले इस साधक ने यह सब ‘स्वांतः सुखाय’ नहीं, ‘सर्वजन हिताय’ किया। इसीलिए उनको सुदीर्घ कृतित्व यात्रा एक निष्काम साधना-पथ है।
पौष कृष्ण 9 वि.सं. 1972 तदनुसार 30 दिसम्बर 1915 को जन्मे भाई रतन कुमार ने जुमेराती (भोपाल) के एक समृद्ध वैश्य घराने (पिता श्री कन्हैयालाल) में जन्म लिया। भोपाल, उज्जैन, आगरा व जबलपुर में शिक्षा प्राप्त की। वे नागपुर विश्वविद्यालय के कला स्नातक थे. 12 वर्ष की आयु से उनका कविता संसार आरंभ हो गया। 1930 में श्री कृष्ण वाचनालय की स्थापना के साथ जैसे उनके भावी जीवन की नींव रख दी गई। 1931-320में भाई साहब ने श्री राजाराम शर्मा के साथ हस्तलिखित मासिक ‘सुमन’ और ‘विहग’ का सम्पादन प्रकाशन शुरू किया। यह भोपाल में हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआत थी। बगावती पत्र मानकर भोपाल की नवाबो हुकूमत ने ‘सुमन’ को प्रतिबंधित कर दिया था। 1932-34 में श्री रामचरण राय के सहयोग से हिन्दी सेवा मंडल की स्थापना की, जिसने भोपाल में हिन्दी-प्रसार की नींव डाली।
1934 में मास्टर लालसिंह ने शासकीय (शिक्षक) नौकरी त्याग दो और भोपाल के पहले हिन्दी साप्ताहिक पत्र ‘प्रजापुकार’ का सम्पादन प्रकाशन किया, इसको शुरूआत में एक सक्रिय सहयोगी के रूप में भाई रतन कुमार जुड़े। 1939 में मास्टर साहब के ‘किसान’ के सम्पादन का दायित्व भाईसाहब को ही सौंप दिया गया था।1940 में भाईसाहब ने ‘हिन्दुस्तान स्टोर्स’ नाम से पुस्तकों एवं स्टेशनरी का प्रतिष्ठान खोला, लेकिन व्यवसाय उनकी प्रवृनि में नहीं था सो सात साल में ही वह बन्द भी कर देना पड़ा.
1944 में वे सुल्तानिया माडल हाईस्कूल में शिक्षक नियुक्त हुए, लेकिन बमुश्किल तीन साल रम सके और 1948 में इस्तीफा दे दिया।
चौथे दशक के मध्य तक भाई साहब की कविताएं ‘कर्मवीर’, ‘नव राजस्थान’ आदि पत्रों में स्थान पाने लगी थीं। 1941 में उनका रुबाइयों का संकलन प्रकाशित हुआ। ‘नई रोत’ फिल्म के गीत और संवाद भी उन्होंने लिखे (1947)।
रतन कुमार जी की अदम्य संघर्षशीलता का चरम बिन्दु 1948 में आया, जब मई में उन्होंने अपने साथियों के सक्रिय सहयोग से साप्ताहिक ‘नई राह’ निकाला। इसी समय विलीनीकरण आन्दोलन शुरू हुआ, जिसकी पहली पंक्ति के नायकों में से एक भाई रतन कुमार रहे। उर्दू ‘नई राह भी आरम्भ हुआ था, जिसे हुकूमत के दमन के कारण बन्द करना पड़ा। 5 जनवरी 1949 को भाई साहब को गिरफ्तार कर लिया गया। जुमेराती में उनके मकान की दूसरी मंजिल पर स्थित ‘नई राह’ कार्यालय को भी सील कर दिया। उन दिनों यह स्थल भोपाल की राजनीतिक, साहित्यिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था। ‘नई राह’ विलीनीकरण आंदोलन का प्रवक्ता था। जिसे पड़ना, बेचना, रखना अपराध माना जाता था। एक जून 1949 को भोपाल रियासत, भारत संघ में विलीन हो गई. ‘नई राह’ 1951 में बन्द हो गया। 1950 से 1974 तक भाई मा. दिगम्बर जैन विद्यालय में (शिक्षक से प्राचायं तक) कार्यरत रहे।
1953-54 में उन्होंने साप्ताहिक ‘हलचल’ का सम्पादन प्रकाशन किया। 1956 में वे दैनिक ‘नवभारत’ के उप सम्पादक और 1958 में सम्पादक बने। 1963-64 में ‘मध्यप्रदेश कांग्रेस पत्रिका’ के सम्पादक और 1965-68 में दैनिक ‘मध्यदेश’ के उपसम्पादक रहे। 1974-75 में उन्होंने ‘देशबन्धु’ का सम्पादन किया। बाद में कुछ वर्षों तक साप्ताहिक ‘जनधर्म, में सहयोगी सम्पादक रहे। 1986-87 में साप्ताहिक ‘फिर नई राह’ का सम्पादन-संचालन किया। इसी बीच भोपाल के कवियों के प्रतिनिधि संकलन ‘उदयनी’ और ‘झील के स्वर’ का सम्पादन उन्होंने किया।
मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, सांस्कृतिक संस्था ‘मधुवन’, लघु समाचार पत्र संघ, ‘हम हिन्दुस्तानी’, कला मंदिर, भोपाल नगर निगम, अग्रवाल युवा परिषद्, प्रणवानन्द पत्रकारिता न्यास, लायन्स क्लब आदि अनेक संस्थाओं ने भाई रतन कुमार के कृतित्व का चन्दन… अभिनन्दन किया है. माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान भोपाल ने उन्हें 1988 के ‘लाल बलदेवसिंह सम्मान’ से विभूषित किया।
16 दिसम्बर 1990 को भोपाल नगर की ओर से ‘भाई रतनकुमार अमृत महोत्सव’ का आयोजन राज्यपाल कुंवर महमूद अली खां के मुख्य आतिथ्य में किया गया। इस अवसर पर उनके काव्य संकलन ‘गूंजते स्वर’ का प्रकाशन किया गया। साहित्य और पत्रकारिता के साथ-साथ राजनीतिक दलों, ब्रमिक कर्मचारी संगठनों सहित समाज के सभी वर्गों की सक्रिय भागीदारी के कारण अमृत महोत्सव गरिमामय आयोजन का अविस्मरणीय अध्याय बन गया था।
एक समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि से फक्कड़पन तक को उनको यात्रा-कथा में, जिसमें ‘हवेली’ में जन्म से लेकर गृहविहीन अवस्था में सरकारी मकान में निधन होने तक की नौचत आई। भाई रतन कुमार ने तमाम कुर्बानियों की कीमत पर एक बहुत बड़ी दौलत हथियाई, यह दौलत है मान-सम्मान की दौलत, प्यार की दौलत, शांति और संतोष की दौलत, लालसा-ईस्या महत्वाकांक्षा से मुक्ति को दौलत और, दौलत के इस पैमाने पर शहर भोपाल की कोई हस्ती अपवाद स्वरूप ही भाई साहब के आसपास ठहर सकती है।
कलम का यह सिपाही जो चलते-चलते कभी थका नहीं। 22 फरवरी 1998 को अनन्त यात्रा पर महाप्रयाण कर गया, कुछ इस तरह-जिये जब तक लिखे खबरनामे, चल दिए हाथ में कलम थामे।
वर्तमान पीढ़ी को उन्हें इस रूप में याद करना चाहिए-
दिलों में जख्म है, तौलिया में जिनके छाले हैं। उन्हीं के दम पे जमाने में ये उजाले हैं।
कोटिशः प्रणाम !
■ विजयदत्त श्रीधर