मशरूम की खेती और उद्यमिता विकास पर दो दिवसीय कार्यशाला संपन्न

भोपाल l बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय के माइक्रोबायोलॉजी विभाग द्वारा आयोजित "मशरूम की खेती और उद्यमिता विकास" विषय पर एक सप्ताह का कौशल विकास कार्यक्रम आज समापन समारोह के साथ संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम 22 से 27 जनवरी 2025 तक आयोजित किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य छात्रों, शोधकर्ताओं और किसानों को मशरूम की खेती की आधुनिक तकनीकों, पोषण संबंधी लाभों और उद्यमिता के अवसरों से अवगत कराना था।
कार्यक्रम की शुरुआत विभाग प्रमुख डॉ. अनीता तिलवारी के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने मशरूम की खेती के फायदों पर प्रकाश डालते हुए कहा, "मशरूम न केवल पोषण और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह आर्थिक रूप से भी लाभकारी है। यह प्रोटीन, विटामिन डी, एंटीऑक्सीडेंट और खनिजों का समृद्ध स्रोत है।"
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मशरूम की खेती पर्यावरण के लिए भी उपयोगी है। उन्होंने बताया कि उत्पादन के बाद बचे हुए वेस्ट से वर्मीकम्पोस्ट तैयार किया जा सकता है, जो जैविक खेती का एक अनिवार्य घटक है।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि डॉ. आई. के. मंसूरी, कुलसचिव, बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, ने छात्रों और प्रतिभागियों को प्रेरित करते हुए कहा, "मशरूम की खेती पर्यावरणीय संतुलन और सतत कृषि के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम न केवल कौशल विकास में सहायक हैं, बल्कि छात्रों को उद्यमिता की दिशा में प्रेरित करने में भी मददगार हैं।"
उन्होंने वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का उदाहरण देते हुए कहा कि असफलता हमें यह सिखाती है कि सफलता के लिए प्रयासों में निरंतरता और समर्पण आवश्यक है।
प्रो. रागिनी गोथलवाल, डीन, फैकल्टी ऑफ लाइफ साइंसेज, ने कहा, "मशरूम की खपत बढ़ाने और इसे एक प्रभावी व्यवसाय बनाने के लिए छात्रों को सीखने और इसे लागू करने की जरूरत है। यह प्रशिक्षण न केवल कौशल विकास का माध्यम है, बल्कि इसे एक आय-सृजन मॉडल के रूप में अपनाने का मार्ग भी है।"
प्रो. विवेक शर्मा, निदेशक, सीआरआईएम, ने प्रतिभागियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा, "मशरूम की खेती में सफल होने के लिए मेहनत और प्रतिबद्धता की आवश्यकता है। यह प्रशिक्षण युवाओं और किसानों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करता है।"
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. विपिन व्यास, प्रमुख, अनुप्रयुक्त एक्वाकल्चर और जूलॉजी विभाग, बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल, उपस्थित रहे। उन्होंने अपने संबोधन में मशरूम की खेती को पर्यावरणीय संतुलन और सतत कृषि के लिए महत्वपूर्ण बताया।
कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने मंच पर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि इस प्रशिक्षण ने उन्हें मशरूम उत्पादन की पूरी प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप से समझने में मदद की।
एक प्रतिभागी ने कहा, "हमने कंपोस्ट तैयार करने, स्पॉन डालने, बैग तैयार करने और मशरूम की खेती के सभी महत्वपूर्ण चरणों को सीखा। यह हमारे लिए एक ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक अनुभव था।"
इस कार्यक्रम में प्रशिक्षकों के रूप में डॉ. नीलम बिसेन, डॉ. जितेंद्र मालवीय, डॉ. बिंदु नाहर, श्रीमती शैलजा शर्मा, श्रीमती मधुरी शिंदे, और नेहा पालीवाल ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने प्रतिभागियों को मशरूम उत्पादन के सभी चरणों की विस्तृत जानकारी और हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण प्रदान किया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. नीलम बिसेन ने कुशलतापूर्वक किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. जितेंद्र मालवीय ने प्रस्तुत किया।इस कार्यक्रम मैं 150 प्रशिक्षणार्थियों ने प्रतिभाग किया