नर्मदापुरम जिला प्रशासन द्वारा नरवाई में आग लगने की घटनाओं को नियंत्रित करनेनरवाई में आग लगने के दुष्परिणामोंसंतुलित उर्वरक प्रबंधन कर खेती से शुद्ध आय में वृद्धि करने एवं ग्रीष्मकालीन मूंग फसल में अत्यधिक मात्रा में कीटनाशकों के प्रयोग से होने वाले दुष्परिणामों के प्रति किसानों को जागरूक करने के लिए जिले के प्रत्येक ग्राम में दिनांक 15 जनवरी 2025 से निरंतर किसान खेत पाठशालाओं का आयोजन किया जा रहा है।

उपसंचालक कृषि श्री जे.आर हेडाऊ ने बताया कि गेहूँ फसल की कटाई के बाद किसानों द्वारा ग्रीष्मकालीन मूंग फसल की बोवनी की जाती है। किसानों को सलाह दी जाती है कि फसल के अवशेष या नरवाई जलाकर नष्ट करने की अपेक्षा उनका उचित प्रबंधन करभूमि की उर्वरा शक्ति एवं पर्यावरण को प्रभावित किए बिना अधिक उपज प्राप्त करें। नरवाई में आग लगाने से मिट्टी में उपस्थित सूक्ष्म जीवाणुकेचुएं व अन्य लाभकारी जीव नष्ट हो जाते हैंमिट्टी की जैव-विविधता समाप्त हो जाती है। नरवाई के साथ कार्बनिक पदार्थ एवं पोषक तत्व जल जाने के कारण मिट्टी की उपजाऊ शक्ति नष्ट हो रही है। इस कारण से समान उपज प्राप्त करने के लिए किसान भाईयों द्वारा वर्ष दर वर्ष और अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जा रहा है। खेत में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा कम होने से मृदा कठोर हो रही है और भूमि की जल धारण क्षमता कम हो रही है। नरवाई जलाने से निकलने वाले धुएं से पर्यावरण प्रदूषित होता हैजोकि मानव समाजपशु-पक्षीयों के स्वास्थय को प्रभावित कर रहा है। नरवाई की आग आस-पास के खेतखलिहानघरों को अपनी चपेट में ले लेती हैजोकि बड़े हादसों का सबब बन जाती है। किसान भाईयों को सलाह दी जाती है किगेहूँ की कटाई के बाद खेत में बचे हुए फसल अवशेष को जलाने के बजाय नरवाई का उचित प्रबंधन करें। आधुनिक तकनीक से निर्मित सुपर सीडर यंत्र एवं पूसा डी-कम्पोजर के प्रयोग से सकारात्मक व सफल परिणाम प्राप्त हो रहे हैं।

खेत की मिट्टी के प्रकारफसल की अवस्था और मौसम की स्थिति अनुसार सही समय परसही विधि सेसही मात्रा में डाला गया उर्वरक ही संतुलित उर्वरक प्रबंधन है। कृषि भूमि की सेहतफसल की आवश्यकता और संतुलित उर्वरक प्रबंधन के विषय में पर्याप्त जानकारी नहीं होने के कारणकिसान भाई आमतौर पर एक ही प्रकार के उर्वरक का आवश्यकता से अधिक प्रयोग करते हैंजो न सिर्फ कृषि उपज की गुणवत्ता के लिए खतरनाक है बल्कि मिट्टी की संरचनासेहत एवं उर्वरा शक्ति को हानि पहुंचाते हैंसाथ ही इससे भूमिगत जल में उर्वरक रसायन की मात्रा बढ़ जाती है इससे मानव स्वास्थ्य और पर्यावरणीय समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं। आवश्यकता से अधिक मात्रा में आदान साम्रगी उर्वरकों का प्रयोग करने से खेती की शुद्ध आय में भी कमी आती है। किसान भाईयों को सलाह दी जाती है कि अपने खेत की मिट्टी का परीक्षण अवश्य कराएं तथा फसल में एकमुश्त एक बार में ही संपूर्ण उर्वरक न देकरअनेक बार में फसल की कांतिक अवस्थाओं पर अनुशंसित सही मात्रा कासही विधि से उर्वरकों का प्रयोग करें।

जिले में कुछ ग्रीष्मकालीन मूंग उत्पादक किसानों द्वारा फसल में कीट व्याधियों के नियंत्रण हेतु कीटनाशी रसायनों के प्रयोग के साथ ही फसल कटाई के पूर्व मूंग फसल को सुखाने के लिए भी गैरअनुशंसित अत्यधिक मात्रा में शाकनाशी रसायनों का प्रयोग किया जाता है। इन जहरीले रसायनों के अवशिष्ट प्रभाव ने मानव स्वास्थयपशुओंकृषि भूमि और पर्यावरण के संभावित संदूषण के विषय में चिंताएं पैदा की हैं। इन चिंताओं को दूर करने के लिए किसानों को एकीकृत कीट प्रबंधन को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे रसायनों का विवेकपूर्ण उपयोग करेंकीटनाशकों और शाकनाशी रसायनों का प्रयोग केवल तब ही करें जब आवश्यक हो एवं पर्यावरणीय दुष्प्रभाव को कम करने के लिए कृषि वैज्ञानिकों द्वारा अनुशंसित मात्रा में रसायनों का उपयोग करे। एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाए एवं ग्रीष्मकालीन मूंग की फसल कटाई से पहले फसल को सुखाने के लिए जहरीले रसायनों का प्रयोग न करेताकि संतुलित रसायनिक उपयोग से फसलों और मिट्टी में कम रसायनिक अवशेषमनुष्यों और पशुओ के लिए स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम करते हैं जिससे स्वस्थ फसलेंरसायन मुक्त उपज प्राप्त हो सकेगी।

दिनांक 15 जनवरी 2025 से आज दिनांक तक जिले में 860 के ग्रामों में किसान खेत पाठशालाएं आयोजित की गई हैजिसमें 18,060 कृषकों की भागीदारी के साथ-साथ 890 जनप्रतिनिधिगण भी उपस्थित रहे। किसान खेत पाठशालाओं का आयोजन निरंतर किया जा रहा है। यह कार्यक्रम जिले में लगभग 10 फरवरी 2025 तक आयोजित किया जावेगाताकि इनके माध्यम से किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धति अपनानेस्वस्थ समाजस्वस्थ वातावरण और बेहतर फसल उपज सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल से दक्ष किया जा सके।

जिले के समस्त किसान भाईयों-बहनों से आग्रह है किग्रामवार आयोजित किसान खेत पाठशालाओं में उपस्थित रहकर नवीन टिकाऊ कृषि पद्धतियों पर बहुमूल्य जानकारी एवं शासन द्वारा चलाई जा रही किसान हितैषी योजनाओं से सहायता प्राप्त करें। पर्यावरणीय अनुकूल टिकाऊ कृषि पद्धतियों में कांति लाकरखेती की शुद्ध आय में बढ़ोतरी करनेकिसानों को सशक्त बनानेपर्यावरण को सुरक्षित करने एवं मानव समाज के लिए उज्जवल भविष्य सुनिश्चित करने में सहयोग प्रदान करें।