भोपाल - 1991 बैच की आईपीएस अफसर श्रीमती प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अफसर के रूप में अपनी अलग पहचान रखती हैं । उन्हें जब भी, जो भी जिम्मेदारी मिली उन्होंने उसे बखूबी निभाया । यह संयोग ही है कि उन्हें पोस्टिंग के दौरान कठिन टास्क ज्यादा मिलें परंतु वे जरा भी विचलित नहीं हुईं और उन्होंने हर बार अपनी शत - प्रतिशत एफर्ड लगाकर स्वयं को साबित करके दिखाया । वर्तमान में वे विशेष पुलिस महानिदेशक (स्पेशल डीजी) होमगार्ड, नागरिक सुरक्षा और आपदा प्रबंधन हैं । वे उस दौरान पुलिस अफसर बनीं जब कहा जाता था कि शरीफ घरों की बच्चियां थाने नहीं जाया करती परंतु थाने जाने की बात तो छोड़िए वे स्वयं पुलिस अफसर बन गई । उनके आईपीएस अफसर बनने का किस्सा भी बहुत रोचक है । दरअसल दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उनके साथ ही होस्टल में रहने वाली छात्राओं को छात्रों द्वारा मोटरसाइकिल से कट मारने की घटना हुई ,वे सहेली के साथ रिपोर्ट लिखाने थाने पहुंची परंतु थानेदार साहब ने एफआईआर लिखने की बजाय आवेदन लेकर दूसरी कॉपी में हस्ताक्षर कर उन्हें वापस लौटा दी, उन्होंने बार-बार एफआईआर लिखने का अनुरोध भी किया परंतु थानेदार साहब ने कठोर शब्दों में कहा कि "वर्दी लगाकर देख हाथ कितने बंधे होते हैं" बस इसी एक वाक्य को सुनकर उन्होंने आईपीएस अफसर बनने का फैसला कर लिया। उस समय लिए गए इस कठिन निर्णय को पूर्ण करने में उनके माता-पिता चट्टान की तरह उनके साथ खड़े रहे और दिन - रात एक कर उन्होंने आखिरकार अपने लक्ष्य को प्राप्त कर ही लिया और वह आईपीएस अफसर बनने में सफल हो गई । सर्विस के दौरान उन्हें संयोगवश कठिन टास्क ही मिलें...भोपाल का संवेदनशील माने जाने वाला मंगलवारा थाना उन्हें पहले टास्क के रूप में ही मिला और वह भी 1992 के बाद के कठिन समय में परंतु उन्होंने सामुदायिक पुलिसिंग के फार्मूले को अपनाकर सबका विश्वास हासिल कर लिया और बड़ी ही आसानी से उस कठिन टास्क को भी पूर्ण कर लिया। उन्हें अपनी सर्विस के दौरान केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर केंद्रीय गृहमंत्री उत्कृष्ट सेवा पदक समेत अनेकों सम्मान भी मिलें । वे जिन - जिन पदों पर रही उन्होंने अपनी कार्यशैली के दम पर अपनी अलग ही छाप छोड़ी। मूलत: बिहार की रहने वाली महिला आईपीएस अफसर प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव ने महिला सशक्तिकरण के लिए अनेकों काम किए हैं जिसके लिए हर स्तर पर उनकी सराहना भी हुई है। वर्ष 2013 में वे जबलपुर में आईजी के रूप में पदस्थ थीं । इस दौरान निर्भया कांड के एक वर्ष होने पर उन्होंने नागरिकों और शासन के सहयोग से तिलवारा घाट से लेकर डुमना एयरपोर्ट तक मानव श्रृंखला बनाई थी । जिसमें महिला सुरक्षा की शपथ दिलाई गई थी, महिला सशक्तिकरण के लिए यह उस समय तक की सबसे बड़ी मानव श्रृंखला थी । उनके इस काम को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड  में भी शामिल किया गया है । उनके उनके पति श्री मनु श्रीवास्तव मध्यप्रदेश शासन में अपर मुख्य सचिव के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और वह आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं । वरिष्ठ पत्रकार तेजेंद्र भार्गव ने विशेष पुलिस महानिदेशक श्रीमती प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव से लंबी चर्चा की । प्रस्तुत है उस साक्षात्कार के मुख्य अंश...प्रश्न : ऐसा कौन सा घटनाक्रम हुआ था जिसके बाद आपने पुलिस अफसर बनने की ठानी और आप पुलिस अफसर बन गयीं ?

जवाब : मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ती थी , हॉस्टल में रहती थी और यूनिवर्सिटी की अध्यक्ष थी , ये 1988 की बात है, उस समय लड़कियों से छेड़खानी आदि बहुत बढ़ गयी थी, छेड़खानी तो बहुत छोटी बात है, सेक्सुअल असोल्ट की घटनाएं बहुत बढ़ गयी थीं , मेरे हॉस्टल की ही 2 - 3 लड़कियाँ मेरे पास आईं, उनको कुछ लड़कों ने मोटरसाइकल से घेर कर उनको छेड़ा था ,  खैर लड़कियों ने हिम्मत दिखायी थी, वो लड़के मोटरसाइकल से गिरे भी थे, लड़कियों ने मोटरसाइकल का नंबर भी नोट कर लिया था और लड़कियाँ उन लड़कों के खिलाफ FIR लिखवाना चाहती थीं I हम लड़कियों ने शिकायत आवेदन बनाकर लोकल थाने गये और थाना प्रभारी को पत्र दिया तो थाना प्रभारी ने अपने हस्ताक्षर कर के हमें एक प्रति वापिस कर दी और कहा कि हो गया, लेकिन मैंने दम देकर कहा कि हमें FIR लिखवानी है तो थाना प्रभारी चिढ़ गए और बोले कि वर्दी लगाकर के देख , हाथ कितने बंधे होते हैं , थाना प्रभारी बोले कि तब तुझे समझ आयेगा कि कितनी FIR कर सकते हैं ?  थाना प्रभारी की ये बात मुझे चुभ गयी और उसके बाद मैंने सिविल सर्विस एक्साम क्रेक किया जिसमें मैंने पुलिस सर्विस का चयन किया हालांकि मैं एकेडमिक में जाना चाहती थी और बाहर जाना चाहती थी I

प्रश्न : महिला सुरक्षा के लिये कानून तो बहुत हैं लेकिन न्याय में देरी होती है , ऐसा क्यूँ ? 

जवाब : अभी जो नई भारतीय न्याय सहिंता लागू हुई है उसमे टाइम बॉउंड कर दिया गया है , इसमें दिक्कत क्या आती है कि जो महिलाएं या लड़कियाँ या छोटे छोटे बच्चियाँ भी सामने आकर शिकायत नहीं करना चाहती, जिसके कारण विलंब होता है , विलंब होने से जो तत्काल रिपोर्टिंग या एविडेंस मिल सकता था, वो मिल नहीं पाता , उसके बाद जो विवेचना होती है उसमें वक़्त लगता है , उसके बाद कोर्ट में चालान पेश होने में विलंब होता है और होता ये है कि जो पाक्सो कोर्ट हैं या बच्चियो के लिये विशेष न्यायालय हैं, उनमें वैसे ही बहुत ज्यादा बोझ है तो सुनवाई में समय लगता है , होता ये है कि केस को निचले कोर्ट से हायर कोर्ट जाते जाते इतना वक़्त लग जाता है कि हम ही भूल जाते हैं कि केस क्या था ? भारतीय न्याय सहिंता में विवेचना के साथ कोर्ट को भी टाइम बॉउंड कर दिया है I भारत सरकार लगातार विवेचना को मॉनिटर कर रही है कि अमुक विवेचना को निश्चित टाइम बॉउंड पीरियड में पूरा किया गया है नहीं ! इससे फर्क आयेगा और फर्क आ भी रहा है I

प्रश्न : एक महिला पुलिस अफसर होने के नाते क्या आपको सर्विस के दौरान कभी किसी भेदभाव या दिक्कत का सामना करना पड़ा ? 

जवाब : जी हां बिलकुल ! देखिये जब मैं पुलिस सर्विस में  34 साल पहले आई थी तब बहुत महिलाएं नहीं थी सर्विस में, तो महिलाओं के लिये बुनियादी सुविधायें भी नहीं थी जैसे अलग से रेस्ट रूम्स नहीं थे, अगर आप अधिकारी हैं तो भी सुविधायें उपलब्ध नहीं होती थीं I मुझे महिला होने के नाते बुनियादी असमानता का सामना करना पड़ता था , दूसरी बात मैंने जो महसूस की कि 30 साल पहले निचले स्टाफ को कमांड करना जितना पुरुष के लिये आसान होता था, उतना महिला के लिए आसान नहीं होता था , एक महिला को रेस्पेक्ट पाने के लिये कहीं ज्यादा मेहनत करनी पड़ती थी लेकिन धीरे धीरे ज्यादा महिलाएं पुलिस सर्विस में आने लगी हैं और स्टाफ की मानसिकता में भी बदलाव आया है I लेकिन ये बात भी सच है कि एक महिला परिस्थितियों के आगे समर्पण करती है या फिर इसको एक चुनौती के रूप में लेकर विपरीत परिस्थितियों को अपने नियंत्रण में कर लेती है I मुझे याद है 1998 में जब मैं सिवनी में पुलिस अधीक्षक थी तब मैंने राष्ट्रीय महिला आयोग और महिला बाल विकास के सहयोग से महिला विमर्श सेमिनार करवाया था जिसमें थानेदार और कांस्टेबल स्तर के स्टाफ को सामान्य संवेदनशीलता के बारे में विचारों का आदान - प्रदान किया था I मैं ये सोचती हूं कि मुझे मौका मिला है कि मैं पुलिस तंत्र में नवाचार या सुधार कर सकूँ या महिला सशक्तिकरण पर काम कर सकूं तो मैंने ये प्रक्रिया 28 साल पहले ही शुरू कर दी थी I

प्रश्न : पुलिस में आ रहे सकारात्मक बदलाव को आप किस नजरिये से देखती हैं ? 

जवाब : देखिये आप पुलिस को समाज से अलग करके एक संस्था के रूप में नहीं देख सकते क्योंकि इसी समाज से निकल कर ही तो लोग पुलिस व्यवस्था में आते हैं और समाज में हो रहे अपराध या अन्य कानून व्यवस्था को सम्हालते हैं , मेरा मानना है कि पुलिस में सकारात्मक बदलाव आने का मुख्य कारण है कि समाज में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं I मेरा ये भी मानना है कि जितना तकनीकी विकास होगा, जितनी पारदर्शी व्यवस्था बनेगी उतना ही सकारामक बदलाव भी होगा और हमारी विधि और प्रशासनिक व्यवस्था जितना पुलिस व्यवस्था को नई तकनीक और बेहतर साधन उपलब्ध करायेगी उतनी ही पुलिस व्यवस्था भी बेहतर होगी, इसके लिये मैं प्रशासन का धन्यवाद करती हूं I

प्रश्न : सामान्यतः ऐसा माना जाता है कि राजनैतिक दबाव के चलते फरियादी को आरोपी और, आरोपी को फरियादी बना दिया जाता है, क्या वास्तव में ऐसा होता है ? 

जवाब : देखिये दबाव चाहे राजनैतिक हो या अन्य किसी प्रकार का हो , वो उतना ही होता है जितना आप लेना चाहते हैं ! इस बारे में ज्यादा कुछ विशेष नहीं बोलना चाहूँगी , मेरे 34 साल के कैरियर में मैंने 8 साल भारत सरकार के अन्य विभागों में भी काम किया है, तो मैंने ये पाया है कि अगर आप अपनी बात को या अपने पक्ष को स्पष्टता से रखने में सक्षम हैं तो ऐसा कोई राजनैतिक व्यक्ति नहीं है जो आपकी बात से पूरी तरह असहमत होकर कहे कि कोई काम करना ही करना है , कम से कम मैंने तो नहीं देखा है और जो दब रहे हैं शायद वो दबना चाहते होंगे मैं नहीं जानती ? 

प्रश्न : मध्यप्रदेश पुलिस का बीता एक वर्ष उपलब्धियों से भरा रहा है , इस दौरान जहां मध्यप्रदेश पुलिस  ने सोशल पुलिसिंग मे नये आयाम स्थापित किये हैं वहीं दूसरी ओर सामाजिक सरोकारों से जुड़े कई अभियान जन-जन के बीच जाकर सफलता पूर्वक पूर्ण कर अवार्ड भी प्राप्त किये हैं, मध्यप्रदेश अब नक्सल मुक्त हो गया है, इस पर आप क्या कुछ कहना चाहेंगी ? 

जवाब : जी हाँ आप बिल्कुल सही कह रहे हैं, इसके लिये मैं बधाई देना चाहूँगी अपने ग्राउंड वर्कर्स को, हमारे सिपाहियों को, कांस्टेबल्स को, सब इंस्पेक्टर्स को , हमारे जूनियर कलींग्स को जिन्होंने बहुत मेहनत की है , लेकिन मैं ये भी कहना चाहूँगी कि ये जो सुखद परिणाम परिलिक्षित हैं वो कई सालों की मेहनत का फल है ,यही कारण है कि हम नक्सल उन्मूलन में सफल  हो पाये हैं ! जहां तक सामाजिक नवाचारों का सिलसिला है तो ये इसलिए जरूरी हो गया है कि अगर हम कम्युनिटी पुलिसिंग की ओर नहीं जाते हैं या समाज को नहीं जोड़ते हैं तो अपराध करने की जो तकनीक विकसित हो गयी है जैसे साइबर क्राइम जैसे अपराधो की रोकथाम करना मुश्किल होगा , इसके लिये हमे समाज से जुडकर काम करना होगा, जरूरी है कि लोगों के लिए पुलिस आसानी से उपलब्ध हो I

प्रश्न : आपके दृष्टिकोण से सफलता का मूल मंत्र क्या है ? 

जवाब : देखिये सफलता का मूल मंत्र सिर्फ परिश्रम, परिश्रम और परिश्रम है और इसके अलावा कोई शॉर्ट कट नहीं होता , जितना हम परिश्रम करेंगे, जितना हम ज्ञान अर्जित करेंगे, जितना हम विधिक ज्ञान अर्जित करेंगे , जितना हम दूसरे राज्यो और देशों के बारे में ज्ञान इकठ्ठा करेंगे, उतनी ही अधिक सफलताएं हमे मिलेगी I

प्रश्न : अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आप महिलाओं को क्या संदेश देना चाहेंगी ? 

जवाब : देखिये अगर छोटी क्लास से बच्ची की प्रतिभा का माता - पिता को पता चल जाये कि ये बड़ी होकर माता - पिता का नाम रोशन करेगी और अभिभावक अगर सोच लें कि वो बच्ची के सपने को पूरा करने में सहयोग करेंगे, तो बच्ची के सपने अवश्य पूरे होंगे, मेरे कहने का तात्पर्य है कि ये बहुत आवश्यक है कि हमारे माता - पिता हमारे साथ हों I बच्चों को मैं कहूंगी कि रुके नही और निश्चित तौर पर फोकसड रहे , आज की जनरेशन में मैं ये समस्या देख रही हूं कि वे लक्ष्य के प्रति केंद्रित नहीं रह पाते हैं, बच्चियों को खासकर अपने लक्ष्य को वैसे ही केंद्रित होकर साधना होगा जैसे अर्जुन ने मछली की आँख को साधा था I सपने देखें, बड़े सपने देखें लेकिन उनको पूरा करने के लिये लक्ष्य को हमेशा सामने रखना होगा, लक्ष्य तक पहुंचने के पहले कुछ और नहीं सोचना है और उसके लिये परिश्रम करना होगा, जब समाज, माता - पिता, दोस्त , शिक्षक आपके प्रयासों को देखते हैं तो वो सहयोग करते हैं कि आपके सपने पूरे हों I मैं बच्चियों से यही कहूंगी कि सपने देखें, उन्हें साकार करें और समाज को अपने योगदान से एक बेहतर जगह बनाएं I