रूठे हुए फूफाओं पर चर्चा का एक सत्र
विजय मनोहर तिवारी
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शादियों में काका भी रूठते हैं, ताऊ भी और मामा भी मगर ब्रांडिंग नामालूम कैसे फूफा की हो गई। शादियाँ न भी हों तो रूठते हैं। आश्चर्य है कभी फूफाओं ने एकल या संगठित रूप से इस पर कोई आपत्ति नहीं ली, कोई याचिका, मानहानि या आरटीआई भी नहीं लगाई। सहज स्वीकार कर लिया। क्या फर्क पड़ता है। जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला। समाज में अनेक प्रकार के फूफा हैं। ध्यान रहे, महत्वपूर्ण शादी नहीं है। महत्वपूर्ण रूठना है। विषय का केंद्र यही है। इसी विषय पर आज के इस सत्र में चर्चा के लिए हम यहाँ एकत्रित हुए हैं…
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देवियो-सज्जनो, भूमिका को लंबा न करते हुए सीधे विषय पर आते हैं। रूठे हुए फूफाओं की सबसे ठोस प्रजाति जन्मजात असंतुष्टों की है। इस प्रजाति के फूफा वर्षाकाल में बादलों पर चिढ़ते हैं, शीत ऋतु में शीतल वायु पर तीर चलाते हैं और ग्रीष्म ऋतु में मार्त्तण्ड पर बरसते हैं। अर्थात् उन्हें कहीं कुछ अच्छा और अनुकूल होता दिखता ही नहीं है। वे फिल्में भी एक्टर की एक्टिंग में खोट देखने जाते हैं और संगीत की किसी सभा में इसलिए कि यदि संगीत में कुछ खामी-खराबी न निकली तो कलाकार के चेहरे या चश्मे में कोई कमी निकाल ला सकें। वे अपने इस प्रयास में कभी असफल नहीं होते। प्रत्येक आयु-वर्ग, क्षेत्र-विधा में फूफाओं की यह बारहमासी प्रजाति है। हर मौसम में हरी-भरी। खूब खाद-पानी हर समय जड़, तना और पत्ती से इसे मिलता ही रहता है।
चीन की चूँ चाँ चिढ़ यूनिवर्सिटी के प्रकृति प्रेमी मनोवैज्ञानिक डॉ. चिंग चेनकवर अपने एक ताजा रिसर्च पेपर में कहते हैं कि जिस प्रकार वर्षाकाल में मिट्टी के अंदर रहने वाले जंतु एक स्वर में प्रकृति को संगीतबद्ध करने के लिए रात भर आलापते हैं, उसी प्रकार ऐसा कोई विषय पकड़ में आते ही समाज के चिढ़े हुए किंतु अब तक शांत बैठे प्राणी अपनी समग्र ऊर्जा से घनीभूत होकर सक्रिय हो उठते हैं।
भारत परंपराओं का देश है। असंतुष्टों की ढलती हुई धारा अपनी अगली पीढ़ी को भी तैयार करती हुई चलती है। इनके बौद्धिक शावक उकसावे में आकर अपने कंधे बंदूक चलाने के लिए बिना विचारे आगे करते हैं और एवज में केवल प्रशंसा पाकर संतुष्ट रहते हैं। प्रशंसा पाकर इन्हें यूरेका अहसास होता है, जो इनकी ऊर्जा को बनाए रखता है। जब ये शावक परिपक्व हो जाते हैं तो अपनी बंदूक चलाने के लिए दूसरों के कंधे देखते हैं। कारतूस कोई तीसरा देता है। निशाना लगाने के लिए दिमाग चौथे का काम करता है।
इंटरनेट युग में इन शावकों का काम दी गई चिंदी को एक्स या फेसबुक या इंस्टा पर उछालने का है ताकि इनके सरपरस्त संध्या समय तक चिंदी की चादर बनाने में लग जाएँ। यह कार्य लाइक्स, शेयर और कमेंट के जरिए चलता है। मिलकर माहौल बनाना यही है। राजनीतिक पंडितों का मत है कि सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास का मूलमंत्र इसी मोहल्ले से कॉपी किया गया है। समाज के सब प्रकार के नाखुश और नाशुक्रे लोगों का यह एक ऐसा क्लाइमेट है, जो कभी चेंज नहीं होता!
कंधा, बंदूक, कारतूस और दिमाग, फूफाओं की उपप्रजातियों के प्रतीक चिन्ह हैं। जैसे जब कोई धर्म अपना आकार बढ़ाता है तो उसकी कई धाराएँ सामने आती हैं, वह कई फिरकों में बटता जाता है। दिगंबर, श्वेतांबर, स्थानकवासी, मूर्तिपूजक, हीनयान, महायान, शिया, सुन्नी, कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट इत्यादि।
रूठे हुए फूफाओं के इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति, परंपरा, साम्राज्य आदि पर बहुत काम हुआ नहीं है। मिस्त्र के मशहूर मदरसा अल-बक्सा के स्कॉलर प्रो. अब्दुल्ला मडगार्ड बताते हैं कि जाहिलियत के दौर में अरब में भी रूठे हुए फूफाओं के सबूत कहीं-कहीं साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध वैज्ञानिक अरबी साहित्य में मिलते हैं लेकिन सातवीं सदी में शमशीर की चमकदार लाँचिंग के बाद यह एक झपाटे में खत्म हो गए। ऐसे फूफाओं का होना ही जाहिलियत का सबूत था और वे अरब की रोशन ख्याल सोसायटी में अब कहीं नहीं मिलते!
असंतुष्टों के इस अनिश्चित जगत में हर असंतुष्ट स्वयं को सृष्टि के केंद्र में विराजित किए हुए है। उसे लगता है कि सृष्टि का कार्य-कारण वही हैं। कोई कैसे उनकी अनदेखी कर सकता है? अज्ञानता से हुई अनदेखी भी अपराध है और इस अपराध का सार्वजनिक दंड है, जो अपयश फैलाकर दिया जाएगा। अत: कौन कब किस कारण किससे खैर खाकर बैठ जाए और किसके कंधे से किसकी बंदूक लेकर किसका कारतूस अपने या किसी और के निशाने पर ठोक दे, कहा नहीं जा सकता। विभिन्न दृष्टिकोणों से फूफाओं के इस असंगठित समाज का समाजशास्त्रीय अध्ययन शेष है। संभव है कि समाजशास्त्र के किसी विभाग में कोई शोधार्थी इस अछूते विषय पर कोई थीसिस किसी योग्य पीएचडीधारी गाइड की छाया में कहीं हो भी रही हो।
एक प्रजाति के फूफे स्वयं को सर्वगुण संपन्न, सर्वाधिक अनुभवी और सक्षमता का प्रमाणपत्र स्वयं के हस्ताक्षर से स्वयं को प्रदान किए हुए हैं। इन्हें लगता है कि बाकी सब यूँ ही महफिल में चले आए हैं, जिन्हें न पीने का सलीका है, न पिलाने का शऊर। अगर सूर्य उगता है तो यह इनकी चिढ़ का कारण इसलिए बन जाता है जैसे ये चलते-फिरते अंधकार हों और सूरज उन्हें चिढ़ाने के लिए ही क्षितिज पर उभरा है।
एक अल्पसंख्यक प्रजाति के फूफा यूँ सामान्य और सकारात्मक दिखाई देंगे। वे वर्षों तक सहज लगेंगे। मगर उनके भीतर की शक्ति किसी एक बिंदु या प्रसंग पर आकर अपना विराट रूप दिखाएगी। कोई सूचना, कोई समाचार, कोई पहल, कोई हरकत अचानक कुछ कर देगी कि उनमें से एक फूफा प्रकट हो जाएगा। ऐसे फूफा यकायक चौंका देते हैं और वर्षों से उन्हें सामान्य समझते रहे सुधिजन स्वयं चकित हो जाते हैं कि अब इन्हें क्या हुआ? जो भी हुआ, मगर ऐसा होता है। इनके गुणधर्म देखकर लगता है कि शायद ही इस धरती पर कोई हो, जिसके भीतर एक छोटा-मोटा फूफा कहीं दम साधकर बैठा न हो! मगर भगवान बचाए!
कुछ निठल्ले फूफा ऐसे हैं, जो दफ्तरों में डोलते हुए हर समय हर किसी से यह कहते मिलेंगे कि कुछ भी करने से क्या होने वाला है। वे यह सब कुछ बहुत पहले ही कर चुके हैं। द्वापर में कुरुक्षेत्र में विराट रूप उन्होंने ही दिखाया था। सारे महान कार्य उनके ही करकमलों से संपन्न हुए हैं, जिन्हें कम्बख्त इतिहास ने याद नहीं रखा है और यह सब करके वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि कुछ भी करने से कुछ भी होने वाला नहीं है और जो व्यर्थ कर्मों में लगे हैं, वे गलत हैं। अत: कुछ न करना ही श्रेयष्कर है।
नुक्कड़ सभाओं, गेट मीटिंगों, सेमिनार-संगोष्ठियों के माध्यम से समाज में कभी क्रांति लाने के लिए निकले लोगों का एक उम्रदराज थकाहारा समूह हमारे बीच है। नीली घिसी जींस और ढीले कुरते पर झोला टाँगे, सिगरेट के कश लेते और मुफ्त की दावतों में यदाकदा बियर की चुस्कियाँ लेते आयु व्यतीत हो गई। या खुदा, इस उम्र में अब वे लाल सलाम को लाल किले से दी जा रही आखिरी सलामी देख रहे हैं।
महामानव मार्क्स के दर्शन में कहीं एक मंत्र नहीं आया कि इस उम्र में यह दिन भी देखने होंगे। देखते ही देखते पता नहीं कब अर्बन नक्सल की चिप्पी अलग से आकर कोई चेहरे पर चिपका गया। आप पूरी या फ्रेंचकट दाढ़ी वाले इन फूफाओं की चिढ़ के सूचकांक का अंदाजा भी नहीं लगा सकते। कोई कुछ न भी कहे तो ये आइना देखकर खुद से ही खुन्नस खा जाते हैं। देवियो-सज्जनो, कुकर सौ डिग्री पर भाप नहीं छोड़ेगा तो कब छोड़ेगा!
भारतीय लोकतंत्र में विभिन्न प्रकार के वोट बैंकों का आविष्कार हुआ। अचानक कुछ ऐसा हुआ कि दशकों सफलतापूर्वक चले कुछ वोट बैंक धीरे-धीरे दिवालिया होते गए। मगर एक नया वोट बैंक फूफाओं के इन फिरकों को जोड़कर बन सकता है। कोई नई पार्टी भी इनकी बन सकती है। एक नया मेनीफेस्टो बन सकता है। हर आयु वर्ग के सारे फूफा एक ध्वज तले, एक चिन्ह तले इकट्ठे होकर आ सकते हैं। स्कोप अपार है मगर असंभव भी है। असंभव इसलिए इस प्रयास में जो भी आगे आकर चमकेगा, लीडर बनेगा, बाकी फूफे ही उसे कहीं का नहीं छोड़ेंगे। वे अपने बौद्धिक शावकों के जरिए सोशल मीडिया मंचों पर ऐसा पोस्ट-प्रहार कराएंगे कि सब एक स्वर में कह उठेंगे-"अभी तो पार्टी शुरू हुई है!'
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( डेक्कन क्रॉनिकल के कार्टून एडिटर सुभानी शेख और पत्रिका के जाने-माने कार्टूनिस्ट शिरीष की ये रचनाएँ आज के इसी विशेष चर्चा सत्र के लिए बनीं थीं। पेशे-खिदमत हैं। सत्र अभी जारी है। हाई टी के बाद फिर लौटेंगे और रूठे हुए फूफाओं पर अगला पावर पाइंट प्रजेंटेशन देखेंगे... )


