शर्म करो सिंघार?

व्यंग्य - राजेन्द्र सिंह जादौन

प्रदेश की राजनीति इन दिनों एक अजीब सी दिशा में जाती दिखाई दे रही है, जहां मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं और शब्द आगे दौड़ रहे हैं। हाल ही में उमंग सिंघार द्वारा सीहोर जिले में एक कलेक्टर को लेकर की गई टिप्पणी ने पूरे प्रदेश में बहस छेड़ दी है। कांग्रेस ने किसानों के मुद्दे पर प्रदेशव्यापी प्रदर्शन किया जो कि लोकतंत्र में विपक्ष की जिम्मेदारी भी है और अधिकार भी। लेकिन इस पूरे आंदोलन में जो बात सबसे ज्यादा चर्चा में रही, वह किसानों की समस्या नहीं बल्कि भाषा का स्तर बन गया।

अब सवाल यह है कि क्या राजनीति इतनी सस्ती हो गई है कि मुद्दों की ताकत कम पड़ जाए तो शब्दों की तलवार निकालनी पड़े? क्या जनप्रतिनिधियों का काम केवल भीड़ को उकसाना रह गया है या उन्हें दिशा भी दिखानी चाहिए? क्योंकि जब एक वरिष्ठ नेता सार्वजनिक मंच से इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करता है, तो वह सिर्फ अपनी नाराजगी जाहिर नहीं करता, बल्कि पूरे राजनीतिक स्तर का आईना भी दिखाता है।

कलेक्टर का पद कोई छोटा-मोटा पद नहीं होता। वह जिले का प्रशासनिक मुखिया होता है सरकार की नीतियों को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी उसी की होती है। किसानों की समस्या हो, कानून-व्यवस्था हो, आपदा प्रबंधन हो या विकास कार्य हर जगह उसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में यदि किसी नेता को उससे असहमति है, तो वह अपनी बात रख सकता है, विरोध कर सकता है, धरना दे सकता है, लेकिन व्यक्तिगत अपमान की भाषा का उपयोग करना क्या उचित है?

जो नेता खुद को जनता की आवाज बताते हैं, वही कभी-कभी ऐसी भाषा बोल जाते हैं, जिससे जनता ही असहज हो जाती है। आखिर जनता अपने प्रतिनिधि से क्या उम्मीद करती है? क्या वह यह चाहती है कि उसका नेता गाली-गलौज करे, या फिर वह चाहता है कि उसका नेता उसके मुद्दों को मजबूती से, लेकिन शालीनता के साथ रखे?

और बात केवल एक व्यक्ति की नहीं है, यह प्रवृत्ति बनती जा रही है। आज एक नेता ने कहा, कल दूसरा कहेगा, परसों तीसरा। धीरे-धीरे यह सामान्य हो जाएगा और फिर राजनीति बहस का मंच नहीं, बल्कि शब्दों की लड़ाई बनकर रह जाएगी। ऐसे में असली मुद्दे किसानों की परेशानी, बेरोजगारी, महंगाई सब पीछे छूट जाएंगे।

यह भी दिलचस्प है कि जिस शब्द का उपयोग अपमान के लिए किया गया, वह भी सोचने पर मजबूर करता है। हमारे समाज में पशुओं को भी सम्मान दिया जाता है। सनातन संस्कृति में तो कुत्ते को भी विशेष स्थान प्राप्त है, उसे वफादारी का प्रतीक माना जाता है और कई स्थानों पर उसे धार्मिक आस्था से भी जोड़ा जाता है। ऐसे में किसी को नीचा दिखाने के लिए इस तरह की तुलना करना न केवल उस व्यक्ति का अपमान है, बल्कि उस सोच का भी द्योतक है जो अपमान के लिए किसी भी स्तर तक जा सकती है।

अगर प्रशासन में खामियां हैं, तो उन्हें उजागर करना जरूरी है। अगर कलेक्टर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहा, तो उसके खिलाफ आवाज उठाना भी जरूरी है। लेकिन आवाज उठाने और अपमान करने में फर्क होता है। एक में ताकत होती है, दूसरे में केवल शोर।

लोकतंत्र में विरोध के कई तरीके हैं निवेदन, आवेदन, प्रदर्शन, आंदोलन, न्यायालय हर रास्ता खुला है। और जब यह सब भी काम न करे, तो राजनीतिक दबाव बनाने के और भी सशक्त तरीके हैं। लेकिन जब भाषा का स्तर गिरता है, तो मुद्दा कमजोर हो जाता है और ध्यान भटक जाता है। फिर चर्चा इस बात की नहीं होती कि किसान क्यों परेशान हैं, बल्कि इस बात की होती है कि किसने किसे क्या कह दिया।

और शायद यही सबसे बड़ा नुकसान है मुद्दे का मर जाना। किसान फिर वहीं खड़ा रह जाता है, जहां से उसने अपनी उम्मीद शुरू की थी। नेता अपनी बयानबाजी में व्यस्त हो जाते हैं और प्रशासन अपनी फाइलों में।
यह पूरा घटनाक्रम एक नाटक जैसा लगता है जहां मंच पर नेता हैं, दर्शक जनता है, और असली कहानी कहीं पीछे छूट गई है। तालियां भी बजती हैं, शोर भी होता है, लेकिन समाधान कहीं नजर नहीं आता।

अब जरूरत इस बात की है कि राजनीति अपने मूल स्वरूप में लौटे। जहां शब्दों में मर्यादा हो, तर्क में दम हो और उद्देश्य स्पष्ट हो। क्योंकि जनता अब केवल नारे नहीं सुनना चाहती, वह परिणाम चाहती है। और परिणाम तभी मिलेगा, जब बहस मुद्दों पर होगी, व्यक्तियों पर नहीं।

बात सीधी है नेता बड़ा हो सकता है, पद बड़ा हो सकता है, लेकिन भाषा उससे भी बड़ी होती है। वही तय करती है कि आप लोगों के दिल में जगह बनाएंगे या सिर्फ खबरों में। और जब भाषा ही नियंत्रण में न रहे, तो फिर किसी और से अनुशासन की उम्मीद करना भी बेमानी हो जाता है।

बाकी… लोकतंत्र है, सबको अपनी-अपनी शैली में बोलने का अधिकार है। पर यह भी याद रखना चाहिए कि अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी आती है और वही जिम्मेदारी असली पहचान बनाती है।