किसी को भी मनमानी की परमिशन नहीं 5000 की अनुमति तो 50000 कैसे आए..?
बंबई उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप निर्णायक रहा। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि जरांगे और उनके समर्थक “उल्लंघनकर्ता” हैं और बिना अनुमति के आज़ाद मैदान पर कब्ज़ा नहीं कर सकते। यह रुख केवल जरांगे के आंदोलन तक सीमित नहीं है, बल्कि समग्र रूप से यह संदेश है कि लोकतंत्र में आंदोलन की स्वतंत्रता और आम नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन अनिवार्य है। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि स्थिति नियंत्रण से बाहर होगी तो न्यायपालिका स्वयं कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगी।
इसके साथ ही महाराष्ट्र सरकार की कमियां भी उजागर हुईं। 5,000 लोगों की अनुमति के बावजूद 50,000 से ज्यादा लोगों का जमावड़ा प्रशासनिक विफलता का उदाहरण है। अदालत ने इस पर भी अपनी नाराज़गी जताई। यह घटना हमें याद दिलाती है कि आंदोलन का अधिकार तभी तक पवित्र है जब तक वह जनजीवन को ठप न करे। न्यायपालिका की सख़्ती ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं की पुनः पुष्टि की है। सामाजिक आंदोलन का रास्ता संवैधानिक होना चाहिए, न कि भीड़तंत्र और दबाव की राजनीति से होकर गुजरना चाहिए।



