मंत्री, विधायक —सब शीशे चढ़ाए निकल जाते हैं, शीशा इसलिए कि सच को देखना ही नहीं चाहते
"...हरी चादर कोई सौंदर्य का प्रतीक नहीं, यह शहर के विकास पर डाला गया परदा है। रायसेन का फट्टा टाकीज़ स्मृति से निकलकर आज व्यवस्था की उस आदत में बदल गया है, जहाँ दरारें भरने के बजाय उन्हें ढक दिया जाता है। यह लेख विकास के शोर में दबाई गई सिसकती ज़िंदगियों, अतिक्रमण के संरक्षण और उस प्रशासनिक बेरुख़ी की कहानी है, जो बच्चों के भविष्य को फट्टे के पीछे फेंककर स्वच्छता और संवेदनशीलता का ढोंग रचती है...।"- संपादक
दिव्य चिंतन
हरी चादर के पीछे सिसकती जिंदगी...
हरीश मिश्र
रायसेन का फट्टा टाकीज़ स्मृति का दस्तावेज़ है। वो भूली दास्तां लो फिर याद आ गई। लोगों को फट्टा टाकीज़ ज़रूर याद होगा। वह टाकीज़ नहीं, दरारों का हवा-महल था। दीवारें ऐसी फटी हुई थीं कि उन दरारों पर फट्टा टंगा रहता था—न दरवाज़ा, न खिड़की, बस फट्टा। दो तीन लोग टिकट लेते थे और पाँच छह लोग पिक्चर देख लेते थे। अंदर जाने वाले टिकट फट्टे में से बाहर फेंक देते थे। बाहर खड़े उनके दोस्त टिकट उठाते और गेट से अंदर प्रवेश कर जाते। विवाद होता, बादशाह मियां मैनेजर थे, अच्छे आदमी थे—पकड़े जाने पर गुस्सा होते, हिदायत देते और फिर छोड़ देते।
वो भूली दास्तां इसलिए याद आ गई कि नगर पालिका, रायसेन ने हरी चादर के पीछे अतिक्रमण और बचपन को छुपाया है।
वैसे पालिका ने कुछ अच्छे कार्य भी किए हैं। शासकीय दीवारों पर ऐतिहासिक कलाकृतियाँ बनवाई हैं, शहर को सुंदर बनाने के लिए फिर से वृक्ष लगाए हैं, स्वच्छता चौपाटी बनवाई है। पुरानी, जो चौपट हो चुकी उस चौपाटी के पास, सागर रोड पर लघुशंका और दीर्घशंका के लिए भव्य शोरूम बनवाया है, जिसका अनावरण शीघ्र ही माननीय करेंगे।
सागर रोड पर, कृषि विभाग के दफ्तर के सामने, पालिका के संरक्षण में अतिक्रमणकारियों ने डेरा डाल रखा है और उस अतिक्रमण पर पालिका ने फट्टा डालकर हरी चादर ओढ़ा दी है।
हरी चादर! जिसके पीछे अतिक्रमणकारियों का अवैध डेरा और बचपन छुपा है। यह चादर स्वच्छता की नहीं, स्वच्छंदता और संवेदनहीनता की है। यह वही चादर है, जो कभी अहमदाबाद में झुग्गियों पर डाली गई थी, ताकि विदेशी मेहमान ट्रंप को गरीबी न दिखे।
सच को ढंकने की पालिका की यह पुरानी आदत है। पालिका के पास नगर विकास का कोई मास्टर प्लान नहीं है। बस दो-चार भाई बैठते हैं, प्लान बनाते हैं और पालकी उठा देते हैं। विकास की पालकी उठाकर समस्या हल नहीं करते, बल्कि समस्या टाल दी जाती है।
अभी कुछ दिन पहले सागर रोड से अतिक्रमण हटाया गया था, वहां दुकानें निर्माणाधीन हैं, यह अच्छी पहल है। जिससे पालिका की आय बढ़ेगी और अतिक्रमण नहीं होगा।
दूसरी ओर किलकारी पार्क बनाया, पार्क के नाम पर पैसा खर्च किया । अब लोक निर्माण विभाग पार्क उखाड़कर ,चौड़े नाले की जगह वहां नाली बनाकर लोक-कल्याण का वादा पूरा कर रहा है। बड़े अरमान से बनाए किलकारी पार्क ने बिना हरियाली के दम तोड़ दिया। जबकि पालिका की योजना उस पार्क में रानी बेल लगाने की थी, लेकिन बेल तो नहीं लगी बिल जरुर लग गए।
यह डेरा ईरानियों का नहीं है, भाइयों का है। इस डेरे की चर्चा न किसी फाइल में है, न किसी समीक्षा बैठक में, न संकल्प से समाधान में। यह डेरा शहर के लिए समस्या है, सरदर्द है। वहाँ गंदगी है, फटेहाल ज़िंदगी है, लेकिन पालिका का वाहन कचरा संग्रह करने नहीं जाता। वहाँ रहने वाले बच्चे पूरे शहर से कबाड़ा इकट्ठा करने जाते हैं। वहाँ अशिक्षा है, शोषण है, बाल-बच्चे भी हैं, लेकिन बाल कल्याण समिति अधिकार दिलाने नहीं जाती। समिति मजिस्ट्रेट की पीठ के रूप में कार्य करती है और उसी समिति ने उन बच्चों की ओर पीठ कर ली है।
वहाँ नशाखोरी है। सामाजिक संस्था कृषक सहयोग संस्था डाइट भवन में सृजन कार्यक्रम के अंतर्गत पुलिस की मौजूदगी में बच्चों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण देती है, लेकिन सामने बसे डेरे में प्रशिक्षण देने नहीं जाती। जहाँ अरुणोदय होना चाहिए, वहाँ अंधेरा है।
इस डेरे में किताबों की जगह शराब की बोतलें इकट्ठी होती हैं, स्लेट की जगह कबाड़। महिला एवं बाल विकास विभाग को ये बच्चे दिखाई नहीं देते, सर्व शिक्षा अभियान को यह जगह याद नहीं आती। शायद इसलिए कि यह फट्टा-अतिक्रमण नगर पालिका ने ही कराया है।
प्रशासन की गाड़ियाँ इस डेरे के सामने से रोज़ गुजरती हैं। मंत्री, विधायक—सब शीशे चढ़ाए निकल जाते हैं। शीशा इसलिए नहीं कि धूप तेज़ है, बल्कि इसलिए कि सच को देखना ही नहीं चाहते। जिस दिन शीशा उतरेगा, उस दिन यह हरी चादर बेकार हो जाएगी।
नगर के जनप्रतिनिधि अच्छे हैं, सहज हैं, सरल हैं, बस उनकी सबसे बड़ी बीमारी यह है कि सत्ता में आने के बाद उनकी दूरदृष्टि ख़राब हो गई है। टाकीज़ टूट गया, लेकिन उसकी संस्कृति ज़िंदा है। पहले फट्टे से टिकट बाहर फेंका जाता था, आज फट्टे के पीछे इंसानियत को फेंक दिया गया है।
क्या प्रशासन और पालिका इस डेरे की महिलाओं और बच्चों को विस्थापित कर, अतिक्रमण हटाकर नई ज़िंदगी देगा और शहर को सच में स्वच्छ करेंगे ?
लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )
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