हरी चादर के पीछे का चौंकाने वाला सच,सिसकती जिंदगी का वो दर्द ...
दिव्य चिंतन
हरी चादर के पीछे का सच…
खिलौनों और शिक्षा से वंचित बचपन
हरीश मिश्र
रायसेन के सागर रोड पर तनी हरी चादर अब केवल एक पर्दा नहीं रही… वह हमारे प्रशासनिक और राजनीतिक चरित्र का सार्वजनिक घोषणा–पत्र बन चुकी है। जिस डेरे का समाचार समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ, वह कोई अदृश्य बस्ती नहीं है। वह खुली आँखों से दिखता हुआ कड़वा सच है। पर सच देखने के लिए केवल रोशनी नहीं, संवेदना भी चाहिए।
समाचार छपा "हरी चादर के पीछे सिसकती जिंदगी…” —लेकिन उसके बाद जो हुआ, वह और अधिक चिंताजनक है। न प्रशासन जागा, न नगर पालिका, न शिक्षा विभाग, न महिला एवं बाल विकास, न सर्व शिक्षा अभियान, न बाल संरक्षण समिति। सामाजिक संगठन और राजनीतिक प्रतिनिधि भी मौन साधे रहे।
26 जनवरी को उसी डेरे के पास “गणतंत्र दिवस अमर रहे” के नारे गूंजते रहे। मंच सजा, तिरंगा फहराया गया, भाषण हुए। प्रभारी मंत्री जी शीशे चढ़े वाहन से गुजर गए।
गणतंत्र का उत्सव था—पर उस बचपन को देखने का समय किसी के पास नहीं था, जो उसी तिरंगे की छाया में हरी चादर के पीछे छुपा बैठा है।
यह मौन साधारण नहीं है। यह वह मौन है जिसे जिम्मेदारी से बचने के लिए ओढ़ लिया जाता है।
जब फाइलों में योजनाएँ संचालित होती दिखती हैं, तो मान लिया जाता है कि सब कुछ ठीक है।
जब कलेक्ट्रेट की बैठकों में चर्चा नहीं होती, तो मान लिया जाता है कि दर्द भी नहीं है।
समस्या का समाधान करने की इच्छाशक्ति नहीं होती, इसलिए उसे हरी चादर से ढंक दिया जाता है। लेकिन विदिशा की सफल शिक्षा समिति के मनोज कौशल, राजकुमार प्रिंस सर्राफ, सुनील त्रिवेदी और अतुल श्रीवास्तव उस डेरे तक पहुँचे। उन्होंने पन्नी बीनने वाले बच्चों का सर्वे किया, उनसे संवाद किया, एक रिपोर्ट तैयार की।
यह केवल सर्वे नहीं था—यह सामूहिक संवेदनहीनता के गाल पर पड़ा एक करारा तमाचा था। सवाल यह नहीं कि एक संगठन गया।
सवाल यह है कि रायसेन में प्रशासन क्यों नहीं पहुंचे ? बाल कल्याण समिति को बच्चों का भविष्य क्यों नहीं दिखा?
सर्व शिक्षा अभियान की दृष्टि वहां तक क्यों नहीं जाती जहां स्लेट और किताब की जगह कबाड़ इकट्ठा होता है ?
महिला एवं बाल विकास विभाग की निगाह उन मासूम चेहरों तक क्यों नहीं पहुँचती ? नगर पालिका की स्वच्छता दृष्टि इस घूरे तक क्यों नहीं जाती ? ...और गणतंत्र दिवस के मंच से कुछ कदम दूर सिसकते बचपन को देखने का समय सत्ता के प्रतिनिधियों के पास क्यों नहीं था?
यह लेख किसी व्यक्ति, दल या प्रशासन के विरुद्ध नहीं है। यह उस प्रवृत्ति के विरुद्ध है जिसमें विकास कागज़ों पर चमकता है, पर ज़मीन पर उतरता नहीं।
योजनाएँ बनती हैं, फाइलें चलती हैं, पर हकीकत वहीं खड़ी रहती है, हरी चादर के पीछे।
अतिक्रमण केवल जमीन पर नहीं हुआ है,संवेदनाओं पर भी अतिक्रमण हुआ है।
बचपन पर अतिक्रमण हुआ है। जब तक यह अतिक्रमण नहीं हटेगा, तब तक कोई भी स्वच्छता अभियान अधूरा रहेगा, कोई भी सौंदर्यीकरण एक छलावा ही रहेगा। अब देखना यह है, यह तमाचा केवल झनझनाहट पैदा करेगा या सचमुच आँखें खोलेगा ? क्योंकि हरी चादर हटे बिना शहर साफ नहीं होगा और संवेदना जागे बिना समाज।
लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )



