दिव्य चिंतन

कागज़ की नावों से 
‘प्रवेश उत्सव’ तक...

हरीश मिश्र ( 9584815781 )


सावन का महीना… आसमान में बादलों की बारात, हवा में भीगी मिट्टी की खुशबू, और हर सुबह जैसे कोई गीत गुनगुनाती थी।
1 जुलाई को जब विद्यालय खुलते थे—उसी मौसम में, जब विद्यालय सिर्फ पढ़ाई नहीं, जीवन का उत्सव होते थे…
जब हम छोटे थे,
तब “स्कूल चलें हम” जैसे अभियान नहीं होते थे,
न ही “प्रवेश उत्सव” का कोई शोर।
हम स्कूल नहीं जाने की जिद करते,
और पिता जी…
दो चांटे मारकर स्कूल में प्रवेश करा आते थे।
बस, हो गया हमारा “प्रवेश उत्सव”!
हम उनके जाते कदमों को तब तक देखते रहते,
जब तक वे नजरों से ओझल न हो जाएँ।
लेकिन तब मौसम भी अपना था,
और दोस्त भी सच्चे होते थे।
उस दौर में
मौसम सुहाना होता था और हमारे साथ पढ़ने आता था—
आसमान में घने बादल,
कभी गरजते, कभी झूमकर बरसते।
सड़कों पर पानी, नालों में बहता सैलाब,
और उसी में कागज़ की नावें…
कीचड़ में पत्थर फेंकना,
और खुद भी छींटों में सराबोर हो जाना—
यही हमारी असली “खेल पीरियड” थी।
कंधे पर छोटा सा बस्ता होता था—
तीन किताबें, चार कॉपियाँ,
नटराज की पेंसिल और रबर…
पर रास्ता मस्ती से भरा होता था।
घर पहुँचने की जल्दी कम,
रास्ते को जीने की फुर्सत ज्यादा होती थी।
अगर कभी स्कूल जाने से जी चुराया,
तो घर में पिता जी की डांट
और स्कूल में मास्टर जी की छड़ी—दोनों स्वागत करती थीं।
जो तब भले कठोर लगती थीं,
पर अब महसूस होता है—
उसी सुहाने मौसम में
पिता जी और मास्टर जी की छड़ी ने
जिंदगी जीने की कला सिखाई है।
100 में से 33 नंबर…
बाप रे! सबसे मुश्किल काम!
लेकिन गम में फांसी पर नहीं लटकते थे,
फिर प्रयास करते थे।
मुश्किल से 33 नंबर आते,
पूरे मोहल्ले को बताते,
और हनुमान मंदिर जरूर जाते—
“आपकी कृपा हो गई… दूसरी बार… हो गए पार!”
वो दौर अलग था—
जहाँ साधन कम थे,
पर खुशियाँ ज्यादा थीं।
जहाँ डर भी था, अनुशासन भी था,
और सबसे बढ़कर—
एक सच्चा और खूबसूरत बचपन था।
लेकिन अब समय बदल गया है।
अब बचपन को व्यवस्थाओं ने छीन लिया है…
अब आयोजन और कमीशन को उत्सव का नाम दिया जा रहा है।
हर चीज़ उत्सव बन गई है—पर भीतर से खोखली।
एसी कमरों में बैठकर योजनाएँ बनाने वालों ने
1 अप्रैल को स्कूल प्रारंभ कर दिया!
मतलब—बचपन से ही “मूर्ख दिवस” की शुरुआत!
गर्मी की तपन में “उत्सव”…
नाम है “स्कूल चलें हम”…
पर इतनी तपन में कौन स्कूल जाएगा?
ये नारा कम, मजबूरी ज्यादा लगता है।
सड़कें वीरान, सूरज की तपिश तेज,
और सरकार के आदेश पर
“प्रवेश उत्सव” का आयोजन।
जो जनप्रतिनिधि खुद शिक्षा से दूर रहे,
वही फीता काटकर बच्चों को पढ़ाई का संदेश देते हैं।
जो खुद नहीं पढ़े—वो स्कूल खोल लेते हैं।
मास्टर जी छड़ी छोड़कर तिलक लगाते हैं,
फोटो खिंचती हैं,
सोशल मीडिया पर वायरल होती हैं,
अखबारों में छपती हैं—
पर बच्चों की असली मुस्कान
इस तपन में कहीं खो जाती है।
आज सब कुछ कागज़ों पर है—
हकीकत कम, दिखावा ज्यादा।
जहाँ कभी बचपन खिलता था,
वहाँ अब औपचारिकताओं का शोर है…
और शायद इसी शोर में,
बचपन धीरे-धीरे कहीं खो गया है।

लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार)