दिव्य चिंतन

ठिकाने लगाने का उत्सव!

हरीश मिश्र

भारत उत्सवों का देश है। यहाँ की संस्कृति में हर दिन  उत्सव है। जन्म से लेकर मृत्यु तक को भी महोत्सव की तरह मनाया जाता है।
बस! “बजट ठिकाने लगाने का…” उल्लेख कहीं धर्मग्रंथों या संविधान में नहीं मिलता, फिर भी 31 मार्च को जनहित में, लोककल्याण के नाम पर अधिकारी-कर्मचारी मिल जुलकर बजट ठिकाने लगाकर उत्सव मनाते हैं।
इस दिन सरकारी कार्यालयों में अधिकारी-कर्मचारी अलग ही ऊर्जा से कार्य करते हैं। साल भर जिन फाइलों पर धूल चढ़ी रहती है, उन पर से अचानक धूल हट जाती है।
कार्यालय के बड़े बाबू जी, जो जनवरी में “देखेंगे” और फरवरी में “सोचेंगे” में लीन रहते हैं, मार्च आते-आते चेत में “चेक” काटकर सिद्ध पुरुष बन जाते हैं।
बजट, जो पूरे साल “जनहित” में खर्च होने की प्रतीक्षा करता है, मार्च के अंतिम सप्ताह में “जनहित से जनहितकारी ” तक पहुँच जाता है। यह एक अद्भुत परिवर्तन होता है—साधारण खर्च अचानक “आवश्यक व्यय” घोषित हो जाता है।
मध्य प्रदेश में इस वर्ष 33% बजट मार्च में खर्च करने की चुनौती थी। लेकिन हमारे अधिकारी-कर्मचारी चुनौतियों से डरते नहीं हैं  उन्होंने उत्सव मना लिया।
जहाँ आम आदमी पैसे बचाने की सोचता है, वहीं अधिकारी-कर्मचारी बजट ठिकाने लगाने की कला में दक्ष होते हैं। यह कला इतनी विकसित हो चुकी है कि अगर ओलंपिक में “बजट खर्च” प्रतियोगिता होती, तो स्वर्ण पदक निश्चित ही किसी शासकीय विभाग के बड़े बाबू के खाते में जाता।
इस दौरान नोटशीटों की गति प्रकाश से भी तेज हो जाती है। फाइलें ऐसे दौड़ती हैं, जैसे उन्हें भी पता हो कि 31 मार्च के बाद उनकी रफ्तार फिर से बैलगाड़ी हो जाएगी। अधिकारी हस्ताक्षर ऐसे करते हैं, जैसे वे सिर्फ स्याही नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण में अपनी भागीदारी दर्ज कर रहे हों।
मार्च के इन आखिरी दिनों में हर चीज जरूरी हो जाती है—टूटी कुर्सियाँ अचानक “अत्यावश्यक फर्नीचर” बन जाती हैं, खाली पड़े मैदान “तत्काल विकास  परियोजना” में बदल जाते हैं और जो काम साल भर टलता रहा, वह 48 घंटे में राष्ट्रहित में पूरा हो जाता है। यह चमत्कार नहीं तो और क्या है?
दूसरे दिन 1 अप्रैल आता है—नए वित्तीय वर्ष का पहला दिन। जनता को बताया जाता है कि अब सब कुछ नई योजना के अनुसार होगा।
जनता मुस्कुराती है… क्योंकि उसे पता होता है कि यह “अप्रैल फूल” का राष्ट्रीय संस्करण है।
दरअसल, यह उत्सव सिर्फ बजट ठिकाने लगाने का नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था की उस मानसिकता का है, जहाँ योजना कम और जुगाड़ ज्यादा चलता है।
यह उत्सव हमें यह भी सिखाता है कि समय पर काम करना कितना जरूरी है—बस अफसोस यह है कि यह सीख हर साल 31 मार्च को ही याद आती है।
अगर हरिशंकर परसाई होते, तो शायद लिखते—
“हमारे देश में अधिकारी-कर्मचारियों को काम करने की जल्दी नहीं होती, लेकिन बजट ठिकाने लगाने की बहुत जल्दी होती है। और अधिकारी जानते हैं कि पैसा बचा तो पाप लगेगा, इसलिए कर्मचारियों के माध्यम से हर हाल में उसे ठिकाने लगाते हैं।”
और सच कहें तो, यह ठिकाने लगाने का यह उत्सव हर साल 31 मार्च को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।

लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार)