खेतों की मिट्टी महकेगी, जब नरवाई न जलेगी
नरवाई प्रबंधन में छिंदवाड़ा की नई पहचान
खेतों की मिट्टी महकेगी, जब नरवाई न जलेगी,
सुपरसीडर संग प्रगति होगी, खुशहाली हर घर पलेगी l
छिंदवाड़ा जिले ने कलेक्टर श्री शीलेन्द्र सिंह के मार्गदर्शन में नरवाई प्रबंधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि दर्ज की है। जहाँ पहले फसल कटाई के बाद खेतों में नरवाई जलाना आम बात थी, वहीं अब किसान इसे संसाधन के रूप में उपयोग कर रहे हैं। जिला प्रशासन, कृषि एवं कृषि अभियांत्रिकी विभाग और कृषि वैज्ञानिकों के सतत प्रयासों से जिले में जागरूकता फैली है और किसानों ने सुपरसीडर जैसी उन्नत तकनीक को अपनाया है। इन्हीं प्रयासों का परिणाम है कि आज छिंदवाड़ा सुपरसीडर उपलब्धता में प्रदेश में दूसरे स्थान पर है और नरवाई जलाने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है। शासन स्तर पर भी जिले के कार्यों की सराहना की जा रही है।
कृषक श्री प्रवेश रघुवंशी: बदलाव की मिसाल - जिला प्रशासन और कृषि विभाग के प्रयासों का प्रतिनिधित्व करते हुए जिले के प्रगतिशील किसान श्री प्रवेश रघुवंशी को आज भोपाल के कोर्टयार्ड मेरियट होटल में आयोजित राज्य स्तरीय फसल अवशेष प्रबंधन कार्यशाला में मंच साझा करने का अवसर मिला। कृषक श्री रघुवंशी ने वर्ष 2022 में जिले का पहला सुपरसीडर अनुदान पर लेकर नरवाई प्रबंधन की शुरुआत की थी। वर्तमान में उनके पास 03 सुपरसीडर मशीनें हैं, जिनसे तीन सीजन मिलाकर लगभग 2200 एकड़ में फसल अवशेष प्रबंधन कर 18 से 20 लाख रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित किया जा रहा है। उनकी इस पहल से प्रेरित होकर जिले के किसानों ने पिछले दो वर्षों में 200 से अधिक सुपरसीडर खरीदे हैं।
नरवाई प्रबंधन में उनके द्वारा की गई प्रेरक पहल ने ही आज उन्हें राज्य स्तरीय मंच से पूरे प्रदेश और अन्य राज्यों के प्रगतिशील कृषकों के बीच अपने अनुभव साझा करने का मौका दिया है। इस कार्यशाला में कृषि विभाग के मंत्री श्री एदल सिंह कंसाना और कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी एवं पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हैदराबाद और प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए प्रगतिशील कृषक भी शामिल थे।
सुपरसीडर - कृषकों का नया साथी - सुपरसीडर फसल अवशेष प्रबंधन का एक उन्नत कृषि यंत्र है, जिसे जीरो टिलेज तकनीक भी कहा जाता है। इससे किसान एक ही बार में फसल अवशेष मिट्टी में मिलाना, जुताई और बुआई का कार्य कर सकते हैं। इस यंत्र के उपयोग से लागत और समय की बचत होती है, पानी की खपत कम होती है तथा मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। साथ ही यह पर्यावरण संरक्षण में मददगार साबित होता है और फसल की पैदावार में भी वृद्धि करता है। इसकी कीमत लगभग ढाई से तीन लाख रुपये तक होती है, जिस पर कृषि अभियांत्रिकी विभाग द्वारा किसानों को 1.20 लाख रुपये का अनुदान दिया जाता है। 45 एचपी या उससे अधिक क्षमता का ट्रैक्टर रखने वाले किसान आवेदन कर योजना का लाभ उठा सकते हैं।
भविष्य की राह - उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मार्गदर्शन में पूरे प्रदेश में फसल अवशेष प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। वे लगातार इसकी प्रगति की समीक्षा कर सभी जिलों को आवश्यक दिशा-निर्देश प्रदान कर रहे हैं। प्रदेश में इस अभियान को सफल बनाने के लिए शासन द्वारा लगातार किसानों को प्रेरित किया जा रहा है। इन्हीं प्रयासों के बीच छिंदवाड़ा जिले ने नरवाई प्रबंधन में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है।
कृषि विभाग के निदेशक श्री अजय गुप्ता ने भी जिले के प्रयासों की सराहना की है। उनका मानना है कि छिंदवाड़ा जिला नरवाई प्रबंधन के क्षेत्र में प्रदेश का मॉडल जिला बनने की ओर अग्रसर है। यह कहानी बताती है कि किसान और प्रशासन साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता को संजोने के साथ ही कृषि को समृद्धि की राह पर ले जा सकते हैं।



