पुलिस सिर्फ पुतला छीन सकती है, असंतोष की आवाज नहीं बुझा सकती
दिव्य चिंतन
गैरतगंज में सड़क पर उतरा किसान!
हर सीजन का वही सवाल: खरीदी कब शुरू होगी
— हरीश मिश्र ( 9584815781 )
गैरतगंज में किसानों द्वारा सड़क जाम केवल यातायात का अवरोध नहीं है बल्कि व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश है। गेहूं की बालियां खेतों से निकलकर मंडी तक पहुंच चुकी हैं, लेकिन सरकारी व्यवस्था अभी भी साफ्टवेयर में उलझी हुई है। खाद्यान्न, सहकारिता विभाग सरकार की छवि धूमिल कर रहे हैं।
किसान, जो मौसम की मार से जूझकर फसल तैयार करता है, अब विभागों की सुस्ती से जूझ रहा है। उपार्जन केंद्रों का समय पर शुरू न होना केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि यह उस भरोसे की दरार है जो हर साल समर्थन मूल्य के वादों पर टिका रहता है।
सवाल सीधा है,
जब सरकार पहले से उपार्जन की तारीखें तय करती है, तो फिर हर साल वही देरी क्यों ?
क्या यह महज़ लापरवाही है या फिर एक व्यवस्थित उदासीनता ?
गैरतगंज में किसानों का आक्रोश अचानक नहीं फूटा। यह गुस्सा उन लंबे आश्वासनों के बाद फूटा है, जहां किसान अपनी उपज के साथ इंतजार करता रहा। यह गुस्सा उस अनिश्चितता से निकला है, जहां लागत तय है लेकिन आमदनी का भरोसा नहीं।
राजनीतिक प्रतिक्रिया भी अपने तय ढर्रे पर रही। कांग्रेस विधायक मौके पर पहुंचे, आश्वासन दे गए, अधिकारियों ने “जल्द शुरू होगा” का मंत्र दोहराया। लेकिन किसानों के लिए “जल्द” अब एक खोखला शब्द बनता जा रहा है, हर सीजन में दोहराया जाने वाला वादा और जब केंद्रीय कृषि मंत्री का पुतला जलता है, तो वह केवल किसी नेता के खिलाफ गुस्सा नहीं होता, वह उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ प्रतीकात्मक विद्रोह होता है जो समय पर काम नहीं कर पाती। पुलिस पुतला छीन सकती है, लेकिन असंतोष की आग नहीं बुझा सकती।
यह घटना एक बड़े संकट की ओर इशारा करती है।
कृषि नीति और ज़मीनी क्रियान्वयन के बीच की दूरी लगातार बढ़ रही है। योजनाएं कागज़ पर समय से बन जाती हैं, लेकिन खेत से मंडी तक आते-आते उनका समय टूट जाता है।
जरूरत केवल उपार्जन शुरू करने की नहीं है, बल्कि उस भरोसे को पुनः स्थापित करने की है जो किसान और सरकार के बीच सबसे बड़ा अनुबंध है।
क्योंकि जब किसान सड़क पर उतरता है, तो यह केवल एक क्षेत्र की समस्या नहीं रहती—यह उस व्यवस्था की परीक्षा बन जाती है, जो देश की रोटी पर टिकी है।
गैरतगंज का जाम खुल गया, उपार्जन भी शुरू हो जाएगा, लेकिन अगर यही ढर्रा जारी रहा, तो हर रोज एक नया आक्रोश जन्म लेगा।
लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार)


