प्राकृतिक खेती वर्तमान समय की आवश्यकता है
सिंगरौली / वर्तमान समय में मृदा को पुनर्जीवित करने एवं मानव स्वास्थ्य की समस्याओं के समाधान में फसलों के योगदान को देखते हुए वर्तमान समय में प्राकृतिक खेती की महत्ता अत्यंत बढ़ गई है। प्राकृतिक खेती न केवल मानव को स्वस्थ पोषण युक्त भोजन उपलब्ध कराती है वरन वह हमारी मिट्टी को पुनर्जीवित कर आने वाली पीढियां के लिए भरपुर उत्पादन देने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र सिंगरौली एवं आत्मा परियोजना, सिंगरौली संयुक्त के द्वारा दिनांक 15 सितंबर 2025 से 19 सितंबर 2025 तक प्राकृतिक खेती का महत्व , आवश्यकता एवं अनुप्रयोग विषयक आवासीय प्रशिक्षण आयोजित किया गया । प्रशिक्षण में केंद्र के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ जय सिंह के द्वारा कृषि सखियों को प्राकृतिक खेती बेशक विस्तृत जानकारी दी गई एवं व्यवहारिक ज्ञान से अवगत कराया गया। कृषि सखियों को प्राकृतिक खेती के आधार स्तंभ बिजामृत ,जीवामृत। धनजीवामृत, वापसा , आच्छादन अंतराससयन अथवा मिलवा, मिश्रित खेती के साथ ही नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, अग्निस्त्र एवं दसपरणी अर्क के महत्व , उत्पादन एवं अनुप्रयोग की सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक जानकारी प्रदान की गई। प्रशिक्षण के चौथे दिन जिला पंचायत सीईओ श्री गजेंद्र सिंह नागेश के द्वारा उपस्थित कृषि सखियों को संबोधित करते हुए प्राकृतिक खेती के महत्व से विस्तृत रूप में अवगत कराया और आवाहन किया कि अधिक से अधिक प्रचार प्रसार कर इस योजना को सफल बनाएं। साथ ही श्री नागेश द्वारा कृषि सखियों को यह भी समझाइए दी गई कि वह अपने घर पर एक इकाई जरूर स्थापित करें जिससे प्रसार के सिद्धांत देख कर सीखो एवं सीख कर करो के माध्यम से इस योजना का अधिक से अधिक प्रचार प्रसार एवं सफल क्रियान्वयन हो सके। केंद्र के वैज्ञानिक डॉक्टर अखिलेश चौबे के द्वारा कृषि सखियों को बताया गया कि प्राकृतिक खेती में फसलों एवं पशुओं का समन्वय किस प्रकार किया जा सकता है । नेशनल मिशन आन नेचुरल फार्मिंग के अंतर्गत पांच दिवसीय 15 सितंबर से 19 सितंबर तक प्राकृतिक खेती का महत्व , आवश्यकता एवं अनुप्रयोग विषयक आवासीय प्रशिक्षण का समापन कार्यक्रम जिला पंचायत सीईओ श्री गजेंद्र सिंह नागेश के मुख्य आतिथ्य एवम् सेवा निवृत्त प्रोफेसर श्रीमती वीणा तिवारी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। श्री नागेश के द्वारा बताया गया कि प्राकृतिक खेती के माध्यम से जहां मृदा एक बार पुनःउरवर होती है, मृदा में सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ती है, लागत में कमी आती है, फसल गुणवत्तापूर्ण प्राप्त होती है । वही हमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, खरपतवार नाशकों पर निर्भरता को समाप्त करती है। प्राकृतिक खेती के अंतर्गत पशुओं के उप उत्पादों यथा गोबर, गोमूत्र का भी सदुपयोग होता है जिससे पशु संरक्षण में भी प्राकृतिक खेती का महत्वपूर्ण योगदान हो जाता है।



