झनक झनक पायल बाजे.... जो राग अड़ाना में है, गाकर श्रोताओं के ह्रदय को झंकृत कर दिया
इंदौर l भारतीय शास्त्रीय संगीत केवल स्वर - लय का विधान नहीं, बल्कि आत्मा की साधना है। इसमें निहित राग समय की धड़कनों से जुड़कर मन के सूक्ष्म भावों को जाग्रत करते हैं एवं ताल जीवन की निरन्तर गति का अनुशासन सिखाती है। यह संगीत भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों का सजीव प्रतीक है, जिसके सतत प्रवाह से भारत की सांस्कृतिक चेतना युगों से आलोकित होती रही है।
मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग इसी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के प्रयास के साथ इन्दौर के जाल सभागृह में दो दिवसीय ‘‘राग अमीर’’ का आयोजन कर रहा है। उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी द्वारा जिला प्रशासन – इन्दौर के सहयोग से पद्मभूषण उस्ताद अमीर खां की स्मृति में आयोजित इस संगीत समागम के दूसरे दिवस गुरुवार को चार संगीत सभाएं सजीं। गायिकी में संगीत घरानों की परम्पराएं तो तबले की थाप पर सुदीर्घ साधना की ज्योति दमक उठी। कलाकारों का स्वागत उस्ताद अमीर खां के पुत्र एवं सुप्रसिद्ध अभिनेता श्री शाहबाज खान, उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी के निदेशक श्री प्रकाश सिंह ठाकुर एवं उप निदेशक श्री शेखर करहाड़कर ने पुष्पगुच्छ भेंट कर किया।
दूसरे दिवस की पहली सभा गायन के नाम रही, मंच पर सुरीले स्वरों के साथ विदुषी गीतिका उमड़ेकर पुणे उपस्थित थीं। ग्वालियर घराने के मूर्धन्य संगीत साधक एवं गायक श्री बालाभाऊ साहब उमड़ेकर की पौत्री एवं श्री श्रीराम उमड़ेकर की पुत्री विदुषी गीतिका ने अपने गायन का प्रारंभ राग पूर्वी के साथ किया। गंभीर, भावप्रधान एवं सांध्यकालीन इस राग में उन्होंने विलंबित खयाल ताल तिलवाड़ा में प्रस्तुत किया, जिसके बोल ऐ टोनवा कर दे माई.... थे। इसके बाद मध्य लय की बंदिश तीन ताल में प्रस्तुत की, जिसके बोल काजर कारे अति सुकुमारे....थे। गीतिका ने श्रृंगार रस की इस बंदिश में नयनों के सौंदर्य को सुमधुर स्वरों में प्रस्तुत किया। अगली प्रस्तुति खमाज में टप्पा की थी, जो पारम्परिक ग्वालियर घराने का था, इसके बोल चाल पैचानी निया.... थे। उनके साथ तबले पर श्री अशेष उपाध्याय एवं हारमोनियम पर डॉ. रचना शर्मा ने सधी हुई संगत दी। अगली संगीत सभा तबला वादन की थी। इन्दौर के ही गुणी एवं ख्यात तबला वादक श्री हितेन्द्र दीक्षित ने अपनी उंगलियों से ताल का जादू बिखेरा। उन्होंने अपना तबला वादन तीन ताल में प्रस्तुत किया। पारम्परिक रूप में पेशकार के साथ पंजाब घराने की विशेषता सुनने को मिली, जिसमें विलंबित लय में बढत करते हुए तिहाईयों से श्रोताओं को आनन्दित कर दिया। वादन को आगे बढ़ाते हुए तिस्र जाति में रेला, चतुश्र जाति में चलन, रेले, कायदों से पंजाब घराने की काट परज सुनाकर अपने तीव्र तबला वादन को चरम पर पहुंचाया। अपने वादन में विशेष रूप से मिश्र जाति एवं मध्य लय में संकीर्ण जाति में टुकड़े, चक्करदारों से वादन का प्रथम चरण का समापन कर द्रुत तीन ताल में टुकड़े अनाघात, टुकड़े बेदम चक्करदार, फरमाईशी चक्करदार, जिसमें पुराने उस्तादों की बंदिशें जैसे करीम बख्श पेरना, फिरोज खां डाढी एवं अपने उस्ताद अल्ला रक्खां की स्मृतियों को जीवंत कर दिया। इतने ओजस्वी तबला वादन ने मौसम की ठंडक में गरमाहट घोल दी। यह तबला वादन की सभा इन्दौर के सुनकार लम्बे समय तक याद रखेंगे। उनके साथ हारमोनियम पर श्री दीपक खसरावल ने योग्य संगत दी।



