चक्रव्यूह ने रचा महाभारत का जीवंत संसार, अभिनय और शिल्प से सजी प्रभावी प्रस्तुति रविन्द्र भवन में शुरू हुआ चार दिवसीय इंडीमूंस आर्ट्स फेस्टिवल 2026
(सुनील सोन्हिया की रिपोर्ट)
भोपाल l रविन्द्र भवन के हंसध्वनी सभागार में गुरुवार को रंगा थियेटर समूह द्वारा आयोजित इंडीमून्स आर्ट्स फेस्टिवल का आगाज एक प्रभावशाली नाट्य प्रस्तुति ‘चक्रव्यूह’ के साथ हुआ। चार दिवसीय इस संगीत और रंगमंच उत्सव के पहले दिन फिल्म अभिनेता नीतीश भारद्वाज की मंच उपस्थिति ने दर्शकों के बीच विशेष उत्सुकता पैदा की और प्रस्तुति को यादगार बना दिया।नाटक की मूल धुरी महाभारत के युद्ध के तेरहवें दिन की वह ऐतिहासिक घटना है, जब अभिमन्यु चक्रव्यूह में प्रवेश करता है। निर्देशक अतुल सत्य कौशिक ने इस सर्वविदित कथा को एक नए और रोचक अंदाज में प्रस्तुत करने का साहसिक प्रयास किया है। यह चुनौतीपूर्ण कार्य इसलिए भी था क्योंकि यह कथा भारतीय जनमानस में गहराई से रची-बसी है, किंतु प्रस्तुति की शैली ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखने में सफलता हासिल की। मंच पर श्रीकृष्ण के रूप में नितीश भारद्वाज का प्रवेश दर्शकों के लिए एक अलग ही अनुभव लेकर आया। उनके संवादों में दर्शन, स्थिरता और गूढ़ अर्थों की सहज अभिव्यक्ति ने कथा को गहराई प्रदान की। “कोई भी अपने कर्मों से रचे चक्रव्यूह से मुक्त नहीं हो सकता” इस केंद्रीय विचार ने पूरी प्रस्तुति को दार्शनिक आधार दिया। वहीं अभिमन्यु की भूमिका में साहिल छाबड़ा ने युवा ऊर्जा, साहस और करुणा का संतुलित चित्र प्रस्तुत किया। इस अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी, अभिनेता राकेश बेदी, शोभा चटर्जी मुख्यरूप से उपस्थित हुईं।
रणनीति और भावनात्मक संघर्ष का प्रदर्शन
नाटक की सबसे बड़ी विशेषता उसका तकनीकी पक्ष रहा। सशक्त प्रकाश योजना, सटीक संगीत संयोजन और जीवंत मंच सज्जा ने युद्ध के दृश्यों को प्रभावी बनाया। तुकांत छंदों में लिखे गए संवादों ने प्रस्तुति को एक काव्यात्मक लय दी, जिससे दर्शक भावनात्मक रूप से कथा से जुड़े रहे। युद्ध के दृश्य न केवल रोमांच पैदा करते हैं, बल्कि उनमें निहित रणनीति और भावनात्मक संघर्ष को भी बारीकी से उकेरा गया है।
कर्तव्यों को प्रभावशाली ढंग से दिखाया
‘चक्रव्यूह’ केवल युद्ध की कथा नहीं है, बल्कि यह जीवन के गहन प्रश्नों को भी उठाता है। कर्म, धर्म, निष्ठा और कर्तव्य जैसे मूल्यों को नाटक ने प्रभावशाली ढंग से सामने रखा। अभिमन्यु की कहानी के माध्यम से यह प्रश्न भी उभरता है कि अधूरी जानकारी और परिस्थितियों का दबाव किस तरह एक वीर योद्धा को नियति के सामने असहाय बना देता है। श्रीकृष्ण की भूमिका के माध्यम से नियति, समय और कर्मफल के जटिल संबंधों को भी संकेतित किया गया है। नाटक की एक और उल्लेखनीय बात यह है कि यह दर्शकों को केवल दृश्यात्मक अनुभव ही नहीं देता, बल्कि सोचने के लिए भी प्रेरित करता है। यह सवाल उठाता है कि जब परिणाम ज्ञात हो, तब भी क्या कर्तव्य से पीछे हटना संभव है? और क्या हर व्यक्ति अपने जीवन के चक्रव्यूह से वास्तव में मुक्त हो पाता है?


