मंच पर सत्ता थी।..., सामने कुर्सियां थी..., लेकिन सवाल नदारद...?
केंद्रीय कृषि मंत्री की पत्रकार वार्ता में चौकीदार! किसानों की आवाज़ उठाने वाले पत्रकारों को पीछे धकेल कर कुर्सियां पर बैठ गए...
ये कैसी पत्रकार वार्ता ? दिव्य चिंतन
पत्रकारिता का दम घुट रहा है… या घोंटा जा रहा है?
हरीश मिश्र ( 9584815781)
उन्नत कृषि महोत्सव का सेमिनार कक्ष सिर्फ एक आयोजन स्थल नहीं रहा, वह आज की पत्रकारिता की एक बेचैन तस्वीर बनकर उभरा। मंच पर सत्ता थी, सामने कुर्सियां थीं, लेकिन सवाल नदारद थे। जो कुर्सियां सवालों के लिए आरक्षित होनी चाहिए थीं, उन पर प्रतीकात्मक रूप से ‘चौकीदार’ बैठा दिए गए और वे पत्रकार, जो किसानों की आवाज बन सकते थे, उनकी आवाज पीछे धकेल दी गई।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दो प्रेस वार्ता रखीं। एक 11 मिनट, दूसरी 16 मिनट चली। समय के लिहाज से भले छोटी लगें, लेकिन असल कमी समय की नहीं, संवाद की थी। पत्रकारों को घंटों इंतज़ार करवाना और फिर सीमित, एक तरफा वक्तव्य देना उस परंपरा को कमजोर करता है जिसमें प्रेस वार्ता सवालों के लिए होती है, न कि केवल सरकारी ब्रीफिंग के लिए।
सबसे चिंताजनक पहलू यह नहीं कि जवाब नहीं मिले, बल्कि यह कि सवाल ही दबा दिए गए। आज पत्रकारिता के भीतर एक नया विभाजन दिखता है। जनसरोकार वाले पत्रकार बनाम ‘इवेंट मैनेजमेंट’ में तब्दील हो चुके चेहरे। अब सेल्फी वाले पत्रकार, सवाल करने वाले पत्रकारों को पीछे धकेल देते हैं, तब पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, एक प्रदर्शन बनकर रह जाती है।
किसानों का दर्द, उनकी वास्तविक समस्याएं—बीज, लागत, बाजार—इन सब पर ठोस जवाब मांगने की जगह अगर तालियां और सेल्फी प्राथमिकता बन जाएं, तो यह केवल एक महोत्सव की विफलता नहीं, लोकतांत्रिक संवाद की पराजय है।
पत्रकारिता का दम घुट रहा है—यह कहना आसान है। कठिन सवाल यह है कि यह दम घुट रहा है, या चौकीदार उसका गला घोंट रहे हैं ?
लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार)


