दिव्य चिंतन

खुशबू आ नहीं सकती कागज के फूलों से...

हरीश मिश्र ( 9584815781 )


उन्नत कृषि मेले का उद्घाटन केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री मोहन यादव एवं अन्य मंत्रियों ने किया। मंच सुंदर और भव्य रुप से फूलों से सजाया गया था। 
    इस मंच पर  चौहान ने अपने उद्बोधन में कहा " मोदी  सरकार का लक्ष्य , खेतों को फूलों,  खुशबू और किसान की मुस्कान से जोड़ना है, किसानों की आय फूलों की खेती से दोगुनी करना  है।
    मैं मंच के सामने पत्रकार दीर्घा में बैठा था, तभी 1971 में आई फिल्म दुश्मन का वह गीत मेरे कानों में गूंज रहा था
“…खुश्बू आ नहीं सकती कागज के फूलों से...”
    समय बदला, सरकारें बदलीं, नीतियां बदलीं, जननायकों की कथनी और करनी  बदली।
     जिस  भव्य मंच पर जननायक ! किसानों की आय दोगुनी करने का संकल्प  ले रहे थे, वह भव्य मंच प्लास्टिक के फूलों से सजा था, यह एक प्रतीक था, नीति और नीयत के बीच की दूरी की।
    फूल उगाने वाला किसान मिट्टी में पसीना बोता है। हर पंखुड़ी में उसके बच्चों की उम्मीदें खिलती हैं। खेतों में उगते फूल सिर्फ रंग नहीं बल्कि खुशबू के साथ उम्मीद भी बिखेरते हैं। गुलाब की पंखुड़ियों में किसान की मुस्कान होती है और गेंदे की माला में परिवार की आय ! लेकिन अब बाजारों में एक अजीब सन्नाटा है, फूल हैं, पर खुशबू गायब है। यह सन्नाटा पैदा किया है प्लास्टिक और सिंथेटिक फूलों के उस उत्पादन ने, जिसने असली फूलों को धीरे-धीरे बाजार से बेदखल कर दिया है। 
प्रदेश में 43,611 हेक्टेयर क्षेत्र में , 40 हजार किसान फूलों की खेती कर रहे हैं।

  लेकिन जब उन्नत कृषि महोत्सव के भव्य मंच पर अपने खेत के फूलों की जगह किसान प्लास्टिक के फूलों की चमक देखता है, तो वह सिर्फ विरोधाभास नहीं, बल्कि विश्वासघात का शिकार होता है।

  जननायक ! किसानों को भरोसा दिलाते हैं, फूलों की खेती अपनाइए, हम साथ हैं। लेकिन सरकार को मंच सजावट के लिए  असली फूलों की जरूरत नहीं। यह द्वंद्व केवल खुशबू का नहीं, अर्थव्यवस्था का भी है। एक तरफ उद्यानिकी विभाग की योजनाएं हैं, दूसरी तरफ बाजार में सस्ते और टिकाऊ प्लास्टिक फूलों की भरमार। किसान लागत, मौसम और बाजार की मार झेल रहा है, जबकि प्लास्टिक बिना मौसम, बिना मेहनत और बिना जोखिम के मंचों पर छाया हुआ है।

सवाल सिर्फ फूलों की खेती का नहीं, बल्कि एक पूरी अर्थव्यवस्था का है, वह अर्थव्यवस्था जो खेत से मंडी और मंडी से मंदिर तक फैली है। बाजार की चकाचौंध में मुरझाते फूलों के खेत, 
त्योहारों और शादियों का मौसम, जो कभी फूल उत्पादक किसानों के लिए ‘सोने की फसल’ लेकर आता था, अब उनके लिए घाटे का सौदा बनता जा रहा है। प्लास्टिक के फूल सस्ते हैं, टिकाऊ हैं और दिखने में भी आकर्षक, बस उनमें जीवन नहीं है, खुशबू नहीं है।
   बाजार भावनाओं से नहीं चलता, कीमत से चलता है। यही कारण है कि असली फूलों की मांग गिर रही है, कीमतें टूट रही हैं और किसान लागत भी नहीं निकाल पा रहा।

यह केवल आर्थिक संकट नहीं है, यह पर्यावरणीय संकट भी है। प्लास्टिक के फूल न तो मिट्टी में गलते हैं, न ही जीवन चक्र का हिस्सा बनते हैं। वे कचरे के ढेर में बदलकर हवा, पानी और जमीन को जहरीला बना रहे हैं।
विडंबना यह है कि जिस देश में फूल पूजा और सम्मान का प्रतीक है, वहीं हम प्लास्टिक के फूलों में खुशबू ढूंढ रहे हैं।

फूलों की खेती सिर्फ किसान तक सीमित नहीं होती, इससे जुड़ा है एक पूरा समूह। खेत में मजदूर, मंडी में व्यापारी, मालाएं बनाने वाले माली, सबकी रोजी-रोटी इसी पर टिकी है।
जब एक किसान घाटे के कारण  फूल उगाना छोड़ देगा , तो उसके साथ कई और हाथ बेरोजगार हो जाएंगे । फूल सिर्फ एक उत्पाद नहीं हैं, वे परंपरा हैं, संस्कृति हैं और प्रकृति का सबसे कोमल स्पर्श हैं। अगर इन्हें प्लास्टिक के हवाले कर दिया गया, तो हम सिर्फ एक फसल नहीं खोएंगे, हम अपनी संवेदनाएं भी खो देंगे।
     प्रश्न यह नहीं कि प्लास्टिक के फूल क्यों ?
प्रश्न यह है कि जब सरकार खुद अपने आयोजनों में असली फूलों को प्राथमिकता नहीं देती, तो किसान किसके भरोसे खेती बढ़ाए ?
नीतियां केवल कागज पर नहीं, व्यवहार में भी दिखनी चाहिए।
यदि मंच पर असली फूल नहीं खिलेंगे, तो खेतों में भी उनका भविष्य मुरझा सकता है।
कभी “कागज़ के फूल” एक रूपक थे—आज वे नीति का आईना बन गए हैं और आईना साफ कह रहा है,खुशबू कभी भी बनावट से नहीं आ सकती । इसलिए सरकार को कानून बनाकर प्लास्टिक के फूलों के उत्पादन पर प्रतिबंध लगाना चाहिए तभी किसान के चेहरे पर मुस्कान और फूलों की खुशबू बरकरार रहे पाएगी।
लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार)