पश्चिमी नकल से हटकर स्वदेशी खेल चेतना को सम्मान देने का प्रयास
दिव्य चिंतन
सांसद खेल महोत्सव :
आज रायसेन अलग रंग में है-
आनंद का रंग है...उमंग का रंग है...उत्सव का रंग..
हरीश मिश्र
लोकतंत्र में सांसद की भूमिका केवल संसदीय क्षेत्र के विकास के मुद्दों को उठाने तक सीमित नहीं है। वह अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि भर नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और भावी पीढ़ी के निर्माण का दायित्व भी वहन करता है।
इसी दायित्वबोध से उपजा है सांसद खेल महोत्सव—एक ऐसा प्रयोग, जो खेल को केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि राष्ट्रचरित्र निर्माण का माध्यम मानता है।
खेल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि बच्चों में साहस और मानसिक सजगता का भाव जागृत करते हैं।शारीरिक और मानसिक विकास के लिए पारंपरिक भारतीय खेलों से बच्चों को जोड़ना चाहिए , जो अनुशासन और देशभक्ति को बढ़ावा देते हैं।
सांसद खेल महोत्सव अपने आंगन की मिट्टी से प्रतिभा को खोजने का अभियान है। गांव के खेत और खलिहान, कस्बे के मैदान , मोहल्लों की गलियों की धूल, यहीं से निकलते हैं वे खिलाड़ी, जिनके भीतर भारत की माटी की धड़कन धड़कती है। खेल की दृष्टि में यह आयोजन उसी आत्मनिर्भर भारत की भावना का विस्तार है, जहां संसाधनों से पहले संस्कार को प्राथमिकता दी जाती है।
खेल केवल शरीर को नहीं गढ़ता, वह मन, अनुशासन और चरित्र को भी साधता है। सांसद खेल महोत्सव में जब एक ही मंच पर कबड्डी, कुश्त, हॉकी, खो-खो , क्रिकेट और पारंपरिक खेल स्थान पाते हैं, तो यह भारतीय खेल संस्कृति की पुनर्स्थापना का संकेत बनता है। यह पश्चिमी नकल से हटकर स्वदेशी खेल चेतना को सम्मान देने का प्रयास है।
यह भी उल्लेखनीय है कि ऐसे आयोजनों में राजनीति का शोर कम और सामाजिक सहभागिता अधिक दिखती है। स्थानीय शिक्षक, प्रशिक्षक, स्वयंसेवक और अभिभावक, सब मिलकर एक सामूहिक उत्सव रचते हैं। यही वह सामाजिक पूंजी है, जो किसी भी राष्ट्र को भीतर से मजबूत बनाती है।
हालाँकि, सांसद खेल महोत्सव को एक दिन का आयोजन बनकर नहीं रह जाना चाहिए। प्रतिभा पहचान, सतत प्रशिक्षण, पोषण, और आगे के अवसर—इन सभी की स्पष्ट योजना आवश्यक है। यदि यह महोत्सव खेलो इंडिया, विद्यालयी खेल ढांचे और स्थानीय अकादमियों से जुड़ जाए, तो यह केवल आयोजन नहीं, बल्कि खिलाड़ी निर्माण की श्रृंखला बन सकता है।
सांसद खेल महोत्सव उस भारत की झलक है, जहां जनप्रतिनिधि सत्ता नहीं, सेवा के माध्यम से नेतृत्व करते हैं। खेल के मैदान में पसीना बहाते बच्चों की आँखों में जब आत्मविश्वास चमकता है, तब समझ में आता है—राष्ट्र निर्माण केवल नीति से नहीं, नीतिमत्ता से होता है।
खेल महोत्सव, यदि सही दिशा और निरंतरता पाए, तो वह दिन दूर नहीं जब हर संसदीय क्षेत्र से एक नहीं, अनेक राष्ट्रीय खिलाड़ी उभरेंगे और तब भारत केवल दर्शक नहीं, विश्व खेल मंच का निर्णायक देश होगा।
लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )
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