पश्चिम बंगाल में फल्टा का माहौल देखकर लोग कह रहे हैं कि गब्बर फिल्म का एक मशहूर डायलॉग है, हड्डियां तोड़ने में वो मजा नहीं है, जो किसी की अकड़ तोड़ने में है। बंगाल में साक्षात इसके दर्शन हो रहे हैं ...
अभिषेक बनर्जी जो अकड़ में ऐसे ऐंठे थे कि गृहमंत्री अमित शाह तक को धमकियां दे रहे थे, आज भींगी बिल्ली की तरह  म्याऊं म्याऊं कर रहे हैं, आन कैमरा रोते हुए बोल रहे थे, टीएमसी वालों को घर में घुसकर मारा जा रहा है, तोड़फोड़ हो रही है।

जहांगीर खान जो वोटरों को तो छोड़िए, आईपीएस अफसर अजय पाल शर्मा तक को धमका रहा था, भरे मंच से बोल रहा था, अगर वो सिंघम है तो मैं भी पुष्पा हूं, 
मैं झुकेगा नहीं साला ...
आज वो भी म्याऊं म्याऊं कर रहा है,
चुनाव से अपना नाम वापस ले चुका है।

बाकी टीएमसी के गुंडे बदमाश माफियाओं की तो  छोडि़ए पब्लिक ने एक एक को पकड़ पकड़ कर कूटा है, एक के बाद एक रोज गिरफ्तार हो रहें हैं। सारी गुंडागर्दी, टोला बाजी, कटमनी, अवैध वसूली सब बंद हो चुकी है ।
आज चाहे कोई बड़ी कंपनी का मालिक हो या कोई छोटा दुकानदार या फिर सडक किनारे सब्जी बेचने वाली कोई महिला सब ने कितने वर्षों के बाद एक राहत भरी सांस ली है, चेहरे पे संतोष भरी मुस्कान है !

अच्छे दिन क्या होते हैं, ये कोई इनसे पूछे ....