हर सत्ता अपना अंत स्वयं लिखती है....
विजयमनोहरतिवारी
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बंगाल के नए नेतृत्व को "पोरिबर्तन' के कुछ सूत्र हेमंता बिस्वासरमा से लेने ही पड़ेंगे, कुछ पाठ योगी आदित्यनाथ से सीखने होंगे और थोड़ा सा पुष्कर सिंह धामी की पहली कक्षा में झांकते हुए आगे बढ़ना होगा। इन तीनों सीनियर्स में एक को तीसरी बार चुना गया है, दूसरे दूसरी पारी खेल रहे हैं और तीसरे पहली बार के सीएम हैं।
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पश्चिम बंगाल की राजनीति पाप का एक ऐसा घड़ा भर रही थी, जो कब का लबालब हो चुका था। उसे इतनी ही जोर से फूटना ही था। अब तक तीन ताकतें ही बंगाल में काबिज रहीं। पहले कांग्रेस, फिर कम्युनिस्ट और फिर टीएमसी। तीनों ही अलग नहीं हैं। तीसरी ताकत पहली से टूटकर ही बनी। पहली और दूसरी की यारी ईमान पर टिकी थी। ईमान का यह तत्व टीएमसी में जन्मजात था। ईमान को मजबूत बताने की होड़ तय करती थी कि घुसपैठियों के प्रति कौन कितना दयावान है। इन नतीजों ने देश के दूसरे हिस्सों में पहले ही दिवालिया हो चुके "मजहबी वोट बैंक' की एक और मजबूत ब्रांच को उजाड़ दिया है।
कम्युनिस्टों के लंबे कब्जे में आने के बाद कलकत्ता धीरे-धीरे एक कबाड़खाना ही बन गया। नाजायज कब्जों और वसूली का ऐसा मॉडल शायद ही देश में कहीं हो। शानदार शोरूमों वाले भीड़ भरे बाजारों के चौड़े फुटपाथ अतिक्रमण में ऐसी दुकानों को दे दिए गए, जिनके मुंह शोरूम की तरफ थे। पूरे कलकत्ता में यह एक समांतर अर्थव्यवस्था है, जिसकी सत्ता कम्युनिस्टों के हाथ से खिसककर टीएमसी के हाथ में आ गई क्योंकि हारने के बाद गलियों के सारे कम्युनिस्ट गिरोह टीएमसी की तगाड़ी उठाने लग गए। कुछ नहीं बदला। पोरिबर्तन केवल एक नारा साबित हुआ था।
1911 के अंग्रेज आर्किटेक्ट और टाउन प्लानर आज के कलकत्ता में राइटर्स बिल्डिंग से होकर तीन-चार किलोमीटर चारों ओर के बाजारों और फुटपाथों पर घूमकर देखें तो एक स्वर कहेंगे-"ये इसी लायक थे।'
केवल कलकत्ता ही नहीं दूसरे शहरों में भी बंगाल विचित्र है। रेलवे स्टेशनों पर आपने कब्जे बाहर देखे होंगे मगर स्टेशन मास्टर के ऑफिस से सटकर दोनों तरफ प्लेटफॉर्मों पर रेल के डिब्बों की तरफ खुलती दुकानों का बाजार देश में कहीं नहीं देखा होगा। रेलवे की जमीन पर प्लेटफार्मों पर कब्जों का यह अनूठा प्रयोग केवल बंगाल में ही संभव हुआ। रेलमंत्री या मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी के "पोरिबर्तन' में यह कोई विषय ही नहीं था। नशे के फैलाव के कारण पंजाब को एक फिल्म में "उड़ता हुआ पंजाब' कहा गया। बंगाल की कई यात्राओं के बाद मैंने बहुत दुख से इसे "सड़ता हुआ बंगाल' कहा था। ये नतीजे बता रहे हैं कुछ उम्मीद बाकी है। वह पूरी तरह सड़ा नहीं है।
जनवरी में मेरा वेलूर मठ और दक्षिणेश्वर जाना हुआ। पहले भी गया हूँ और कोलकाता के वे स्थान, जहाँ स्वामी विवेकानंद की स्मृतियाँ ताजा हैं। महर्षि अरविंदो, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बंकिमचंद्र, शरतचंद्र के अलावा बड़ा बाजार की पुरानी इमारतों के बीच ठाकुरबाड़ी, जहाँ गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर के परिवार की अनगिनत यादें हैं। हर बार मैं सोचता रहा कि ये विभूतियाँ अगर आज के बंगाल की हालत देखें तो क्या सोचेंगी? इतने गहरे सांस्कृतिक संस्कारों और सरोकारों वाले पुनर्जागरण की भूमि को यह कौन सा अभिशाप जकड़े हुए है?
बंकिम अपनी मातृभूमि का वंदन करने के लिए उस सरहद के किस तरफ मुंह करेंगे, जिसकी दूसरी ओर से आने वाले अवैध घुसपैठिए इस तरफ के बंगाल का राजनीतिशास्त्र,अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र उलटने में लगे हैं और उन्हें पोसने वाले यहाँ वंदनवार सजाए हुए हैं। उन्हें कलकत्ता से ढाका तक देखना होगा कि डायरेक्ट एक्शन से रक्तरंजित उनकी मातृभूमि किस बुरे हाल से गुजरी है और रक्तबीजों की अमरबेल कहाँ-कहाँ लिपटी पड़ी है। अतीत में झाँकना हर समय सुखद नहीं होता मगर वह ब्लैक एंड व्हाइट में कुछ निष्कर्ष हमें जरूर देता है।
कोई भी राजनीतिक दल सीटों की संख्या के हिसाब से सिमटना और सिकुड़ना बाद में शुरू करता है, पहले वह वैचारिक रूप से दिवालिया होता है। विचार ही राजनीति में महत्वपूर्ण है। आजादी के बाद का इतिहास हर दशक में हर राज्य में अपनी परतें उघाड़ता है।
स्वाधीनता संघर्ष की खुमारी सत्ता में जितना टिकाए रख सकती थी, टिकाया मगर भारत के लिए कोई नया और मौलिक विचार उस दौर की राजनीति पैदा नहीं कर सकी। सत्ता ही विचार में थी, जो केंद्र के बाद राज्यों में भी परिवार केंद्रित होती गई। इसलिए आपातकाल तक आते-आते सब बिखरने लगा। विचारहीन राजनीति कोई सबक सीखने लायक भी नहीं बचती। बूढ़े दरख्त की सूखी शाखें ठूँठ हो जाती हैं। हरी कोंपले वहाँ नहीं आती। रात के वक्त वहाँ बैठे उल्लू सिर घुमाकर आँखें चमकाते हैं।
आजादी के बाद हुए हजारों छोटे-बड़े आंदोलनों को देखें। ऐसे आंदोलन जिन्होंने देश की राजनीति को स्थाई रूप से प्रभावित और परिवर्तित किया। अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन को आप किस कसौटी पर रखेंगे? एक विचार को लेकर कुछ नेता एक नई-नई पार्टी बनाकर देश में घूमते-भटकते रहे। उन्हें दकियानूसी कहा गया, जिनका आधुनिक विश्व की जरूरतों से कोई सरोकार नहीं था। वे बार-बार की हार से भी नहीं हारे। हार-हारकर भी अपने विचार पर टिके रहे-तुष्टिकरण का विरोध, कश्मीर में 370, समान नागरिक संहिता और अयोध्या में एक मंदिर। सब हँसते थे। गरियाते थे। मजाक उड़ाते थे। मगर उनके पास कोई दूसरा मौलिक विचार भी नहीं था। सत्ता में उनके परिवार थे। दिल्ली, लखनऊ, पटना, श्रीनगर, चेन्नई, चंडीगढ़ में सत्ता परिवारों के पास थी। विचारहीन पारिवारिक रियासतें, जिनके लिए सत्ता ही विचार थी।
बंगाल पर लौटते हैं। बंगाल एक कठिन और जटिल राजनीतिक भूमि है। दशकों की बिगड़ी आदतें हैं, जो रक्त में समा गई हैं और इनका शुद्धिकरण सरल नहीं है। दो सौ पार का यह परिणाम बेचैन बंगालियों की अनंत अपेक्षाओं का एक भारी-भरकम बोझ भी है, जो अब नए कंधों पर है। मगर असंभव को संभव बनाना भी केवल राजनीति से ही संभव है। बिहार, यूपी और असम में एक जैसी समस्याओं का विस्तार है, जिनमें डेमोग्राफी सबसे चिंतानक है। वोट बैंक बनाकर तुष्टिकरण की राजनीति ने इस घुन को लगभग पूरे देश में फैलने के लिए अनुकूल जमीन तैयार की है, जिसके बुरे परिणाम पूरे देश में उबलते देखे जाते हैं।
बंगाल के नए नेतृत्व को वास्तविक पोरिबर्तन के लिए असम, यूपी और उत्तराखंड के तजुर्बों से बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है। परिणाममूलक पोरिबर्तन के कुछ सूत्र हेमंता बिस्वासरमा से लेने ही पड़ेंगे, कुछ पाठ योगी आदित्यनाथ से सीखने होंगे और थोड़ा सा पुष्कर सिंह धामी की पहली कक्षा में झांकते हुए आगे बढ़ना होगा। इन तीनों सीनियर्स में एक को तीसरी बार चुना गया है, दूसरे दूसरी पारी खेल रहे हैं और तीसरे पहली बार के सीएम हैं। इस गुरुकुल में केवल ये तीन ही बंगाल के नए नेतृत्व के लिए अनुकरणीय पाठशालाएँ हैं और सबसे ऊपर दिल्ली के कुलाधिपति। कठोर अनुशासन, सुविचारित योजना, निर्णय क्षमता और निडरता से क्रियान्वयन कुछ ऐसे मंत्र हैं, जो सबके लिए प्रभावी होते हैं। इन पर अमल के लिए किसी ने किसी को नहीं रोका है।
बंगाल लंबे समय के लिए अवसर देता है। वह दूसरे उन राज्यों जैसा नहीं है, जहाँ एक बार ये और दूसरी बार वो। बंगाल बार-बार के बदलाव में यकीन नहीं करता। वह एक बार ही झाड़ू फेर देता है। आजादी के बाद कांग्रेस सिरमौर रही, तीन दशक तक कम्युनिस्टों को सिर पर बैठाया और डेढ़ तक टीएमसी को लादे रहा। अक्ल देर से आती है मगर आती जरूर है। जब आई तो दोनों को हुगली में डुबो भी दिया मगर दोनों के चक्कर में कीमती 50 साल बरबाद भी हो गए। देश कहाँ से कहाँ पहुँच गया और बंगाल किस चक्रव्यूह में फँसा रहा।
अब अगले खिलाड़ी विजेता बनकर आ रहे हैं तो 80 साल के इन तजुर्बों से कुछ सीखकर वे उम्मीदें जगा सकते हैं। एक लंबी पारी उनके हिस्से में है। 15 साल पहले टीएमसी ने बड़े जोर से पोरिबर्तन का नारा कम्युनिस्टों के कुशासन से मुक्ति के रूप में दिया गया था। मगर टीएमसी ने कम्युनिस्टों की राजनीतिक टेम्पलेट से ही काम चलाकर बंगाल की बदहाली को और बढ़ा दिया। पोरिबर्तन के अब तक नारे सुनता रहा बंगाल क्या सचमुच में पोरिबर्तन का स्वाद चख पाएगा?
सत्ता अपना आरंभ स्वयं लिखती है और अपना अंत भी। बंगाल में एक अंत लिखा गया है और एक आरंभ भी!


