दिव्य चिंतन

आंसू पर लिखूं या महोत्सव पर...

हरीश मिश्र ( 9584815781 )

  रायसेन l आसमान तप रहा है, नीचे खेत जल रहे हैं। सड़कों पर सायरन बजाती दमकल चीख-चीख कर बता रही है, आग लगी है ! आग ! दमकल की सांसें फूल रही हैं, किसानों की किस्मत राख हो रही है। गेहूं की सुनहरी बालियां, जो कल तक किसान की बेटी की विदाई का सपना थीं, आज धुएं में बदलकर आसमान में बिखर रही हैं। दमकल सिर्फ आग नहीं बुझा रही, वह किसानों के सपनों की चिता पर पानी डाल रही है, एक ऐसा अंतिम संस्कार, जिसमें सपने टूट गए और सहारा भी नदारद। उसकी छाती फट रही है। आंसुओं का सैलाब दम तोड़ती बेतवा में समा रहा है। 
    दूसरी तरफ भी सायरन बज रहे हैं, लेकिन ये दमकल के नहीं, पुलिस गाडियों के हैं। यहां "आग" नहीं, “आगमन” है। कृषि महोत्सव की तैयारियों का जायजा लेने माननीय ! बार बार आ रहे हैं।   
                 अधिकारियों-कर्मचारियों की सांसें यहां भी फूल रही हैं, पर वजह अलग है, यहां आग बुझाने की नहीं, आयोजन चमकाने की दौड़ है।
   दशहरा मैदान, रायसेन में पूरे प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारी डेरा डाले हुए है। सरकारी खजाना ऐसे बह रहा है, जैसे सूखी बेतवा में अचानक कृत्रिम बाढ़ आ गई हो। विकास के दावे चमक रहे हैं, इतने कि किसानों के जले हुए खेतों की कालिख भी उन्हें धुंधला नहीं कर पा रही।
एक तरफ खेत जल रहे हैं, दूसरी तरफ मंच सज रहे हैं। एक तरफ सपने राख हो रहे हैं, दूसरी तरफ भाषण  के लिए मंच तैयार हो रहे हैं। एक तरफ समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदी केंद्र शुरू हो हैं रहे, दूसरी तरफ बारदान नदारत है।

    अधिकारी भाग रहे हैं, दफ्तर सूने हैं , व्यवस्थाओं का शोर है और सरकारी पैसे से तपती धरती पर “कृत्रिम पौधे” मंच पर " प्लास्टिक के फूल "लगाए जा रहे हैं, ताकि तस्वीरों में हरियाली दिखे, भले ही हकीकत में धुआं उठ रहा हो।
    अब दुविधा यह है कि कलम किस ओर झुके—
उन आंसुओं की ओर
या उस महोत्सव की ओर, 
मैं साहित्य की उस परंपरा को याद करूं, जहां प्रेमचंद ने किसान के दर्द को शब्द दिए थे,
या फिर आज की प्रेस
 की तरह, जले हुए खेतों के धुएं में भी “ महोत्सव ” की रोशनी तलाश करूं...

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार )