शब्दों में आग भी हो सकती है और उजाला भी , जो अंधेरे में दीया बनकर जले, बिना डरे, बिना झुके
दिव्य चिंतन
सत्ता से सवाल, #सत्य से संवाद !
हरीश मिश्र
राजस्थान की रेत मे शब्दों की तपस्या का जन्म हुआ था, कर्पूर चंद्र कुलिश के रुप में। वे सिर्फ एक अखबार के संस्थापक नहीं थे, बल्कि पत्रकारिता के उस युग के शिल्पी थे, जहां खबरें बिकती नहीं थीं, खबरों से खेला नहीं जाता था, बल्कि खबरें जनचेतना को झकझोरती थीं।
राजस्थान पत्रिका को उन्होंने एक मिशन की तरह खड़ा किया—एक ऐसा मिशन जिसमें “पाठक ही सर्वोपरि” रहा, यह केवल नारा नहीं, बल्कि हर शब्द की आत्मा थी। “य एषु सुप्तेषु जागर्ति”—यानी जब दुनिया सोती है, तब जागने और जगाने का काम किया।
आज जब हम उनके जन्मशती वर्ष पर स्मरण कर रहे हैं, तो यह केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि दिव्य चिंतन का अवसर है। उस दौर में जब सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसरा होता था, तब कुलिश जी की कलम दिव्य घोष करती थी। उनकी पत्रकारिता में न तो भय था, न पक्ष था ,न विपक्ष ,केवल सत्य ।
गुलाब कोठारी ने उस विरासत को न केवल संभाला, बल्कि कांटों में विरासत को सहेज कर रखा। उस परंपरा को आज भी जिंदा रखा है, जो सिर्फ सूचना नहीं, सत्ता की आंखों में आंखे डालकर सच कहने का साहस रखती है।
माटी से जुड़ कर पत्रकारिता का अर्थ है—सत्ता से सवाल, समाज से संवाद और सत्य के प्रति अडिग विश्वास। कुलिश जी ने यही सिखाया कि पत्रकारिता कोई व्यवसाय नहीं, बल्कि ध्येय है।
उनकी कलम ने यह साबित किया कि शब्दों में आग भी हो सकती है और उजाला भी। सच्ची पत्रकारिता वही है, जो अंधेरे में दीया बनकर जले, बिना डरे, बिना झुके।
कर्पूर चंद्र कुलिश जी को शत-शत नमन्—आपकी विरासत हर उस कलम में जिंदा है, जो सच लिखने का साहस रखती है।
( स्वतंत्र पत्रकार 9584815781 )


