दिव्य चिंतन 

मित्रता का धर्म

हरीश मिश्र 

रामायण का प्रसंग है। विभीषण पर जब रावण ने प्राणघातक शक्ति छोड़ी तो भगवान राम ने उसे अपने ऊपर झेल लिया। मित्रता का यही धर्म है—मित्र संकट में हो तो उसके लिए स्वयं को ढाल बना लेना।

आवत देखि सक्ति अति घोरा।
 प्रनतारति  भंजन प्रन मोरा ।
तुरत विभीषण पाछे मेला।
सन्मुख राम सहेउ सो सेला।

 


 पर मित्रता का दूसरा धर्म भी है—यदि मित्र कर्तव्यपथ से भटक जाए तो उसे डाँटना, रोकना और भय दिखाना भी आवश्यक है। सुग्रीव जब राज्य सुख में डूब गया तो भगवान राम ने लक्ष्मण को भेजकर उसे चेताया। तुलसीदास जी ने लिखा—

“तब अनुजहिं समझायऊ, रघुपति करुणा सीव।
भय दिखाय लै आबऊ, तात सखा सुग्रीव।।’’

अब इस दृष्टांत को आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर रखकर देखिए। जब डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार सत्ता में आना चाहते थे तो उन्होंने भारत से मित्रता का राग छेड़ा। मोदी सरकार के समर्थन के कारण भारतवंशी मतदाताओं ने उनका समर्थन  किया। सत्ता में आते ही उन्होंने वही किया जो सुग्रीव ने राज्य पाते ही किया—वैभव और स्वार्थ में डूब गए। भारत ने सैन्य शक्ति के अदम्य साहस की दम पर आपरेशन सिंदूर के माध्यम से नापाक इरादों को नेस्तनाबूद कर दिया। तब ट्रंप ने श्रेय और नोबल शांति पुरस्कार लेने का प्रयास किया, भारत की स्पष्ट नीति से बौखलाकर 
अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने टैरिफ जैसे घातक कदम उठाए।

भारत ने भी वही किया जो राम ने किया था—भय ट्रंप को दिखाया और भय दिखाने के लिए रूस और चीन से मित्रता का संतुलन साधा। आज ट्रंप को कहना पड़ा कि “हमने भारत और रूस को चीन के हाथों खो दिया।” यह कथन केवल ट्रंप की खिन्नता नहीं है, बल्कि अमेरिकी विदेशनीति की विफलता का दर्पण है।

ट्रंप यह क्यों भूल गए कि मित्रता का रिश्ता केवल भोग और स्वार्थ पर नहीं, बल्कि सम्मान और संतुलन पर टिकता है? भारत अब 1947 का नवजात राष्ट्र नहीं है, जो हर वैश्विक शक्ति के आगे हाथ फैलाए। भारत अब  राम की नीति पर चल रहा है—जो मित्रता निभाता भी है और आवश्यकता पड़ने पर मित्र को डाँटता भी है।

रामायण की सीख यही है कि मित्रता केवल संकट में साथ खड़े होने का नाम नहीं, बल्कि मित्र को सही मार्ग पर लाने का दायित्व भी है। ट्रंप यह भूल गए। और यही भूल आज उनके बयान में छिपी खीझ के रूप में सामने आई।