दिव्य चिंतन

फिर वादों का मेला... 

हरीश मिश्र ( 9584815781 )

रायसेन का दशहरा मैदान यह सिर्फ एक भूखंड नहीं, बल्कि प्रतीकों का संगम है। हर वर्ष यहां रावण दहन के साथ असत्य पर सत्य की विजय का उद्घोष होता है, और हर चुनावी मौसम में यही मंच वादों की नई पटकथा लिखता है। लेकिन इस बार, दुर्गा अष्टमी के अवसर पर इसी धरती पर एक और कथा का बीजारोपण हुआ है, फिर वादा किया जा रहा है किसानों की तकदीर बदलने का।
केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान का वहां पहुंचकर तैयारियों का जायजा लेना महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं था। उनके शब्दों में, यह आयोजन औपचारिकता से आगे बढ़कर एक संदेश है, कि खेती अब परंपरा की परिधि में सिमटी हुई गतिविधि नहीं, बल्कि तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार के त्रिकोण पर टिका एक समग्र उद्योग बनती जा रही है।
11 से 13 अप्रैल के बीच प्रस्तावित यह राष्ट्रीय कृषि मेला अपने दावों में जितना व्यापक है, उतना ही अपने प्रभाव को लेकर प्रश्नों से घिरा हुआ भी। 200 से अधिक स्टॉल, 10 एकड़ में फैला आयोजन और देशभर से आने वाले प्रगतिशील किसान, वैज्ञानिक और कंपनियां—यह सब मिलकर इसे एक ‘कृषि कुंभ’ का स्वरूप देने की कोशिश करते हैं। लेकिन भारतीय लोकतंत्र की विडंबना यही है कि यहां हर बड़ा आयोजन अपने साथ एक बड़ा सवाल भी लेकर आता है।
क्या ये मेले सच में खेतों की मिट्टी तक बदलाव पहुंचाते हैं या फिर योजनाओं के उत्सव बनकर रह जाते हैं ?
शिवराज सिंह चौहान ने इसे “किसानों की आय बढ़ाने का महायज्ञ” कहा है। यह उपमा सिर्फ अलंकार नहीं, बल्कि उस सच्चाई की स्वीकारोक्ति है कि भारतीय कृषि आज भी उत्पादन से अधिक आय के संकट से जूझ रही है। हरित क्रांति ने पेट तो भरा, लेकिन जेबें अब भी खाली हैं।
परंपरागत खेती के साथ फलों, फूलों, सब्जियों, मधुमक्खी पालन और पशुपालन की बातें नई नहीं हैं। ये सुझाव वर्षों से नीति दस्तावेजों और भाषणों में मौजूद हैं। फर्क इतना है कि अब इन्हें ‘लाइव डेमो’ और ‘टेक्नोलॉजी शोकेस’ की चकाचौंध में पेश किया जा रहा है। यह बदलाव संकेत देता है कि सरकार अब ‘ज्ञान के वितरण’ को भी उतना ही अहम मान रही है, जितना ‘संसाधनों के वितरण’ को।
लेकिन यहीं पर असली चुनौती शुरू होती है।
भारत का किसान जानकारी के अभाव से नहीं, बल्कि संसाधनों और घोषणाओं से जूझता है। वह जानता है कि ड्रिप इरिगेशन क्या है, पॉलीहाउस कैसे काम करता है, और फसल विविधीकरण क्यों जरूरी है। पर सवाल यह है कि क्या वह इन तकनीकों को अपनाने की आर्थिक क्षमता रखता है ? क्या संस्थागत समर्थन और बाजार की स्थिरता उसके साथ खड़ी है ?
यदि इन सवालों के जवाब ‘ना’ में हैं, तो कोई भी मेला—चाहे वह कितना ही भव्य क्यों न हो—एक दर्शनीय आयोजन बनकर रह जाएगा, परिवर्तन का साधन नहीं।
रायसेन का यह आयोजन एक अवसर है—सरकार के लिए अपनी नीतियों को जमीन पर परखने का और किसानों के लिए अपने भविष्य की नई संभावनाओं को समझने का। पर यह अवसर तभी सार्थक होगा, जब यह “इवेंट” से आगे बढ़कर “इम्पैक्ट” में बदले।
दशहरा मैदान हर साल रावण के पुतले को जलते हुए देखता है। इस बार, चुनौती यह है कि क्या यहां से निकलने वाला यह ‘कृषि महायज्ञ’ किसानों की समस्याओं के असली रावण को भी जला पाएगा, या फिर यह भी एक और उत्सव बनकर स्मृतियों में सिमट जाएगा।

( स्वतंत्र पत्रकार )