"...बसंत केवल ऋतुओं का बदलाव नहीं होता, वह समाज के तापमान को भी परखता है। जब सरसों पीली होती है और आमों पर बौर आते हैं, तब सत्ता और व्यवस्था के आंगन में भी नई उम्मीदें दस्तक देती हैं। मगर हर बसंत खुशबू नहीं लाता—कुछ बसंत सवाल लेकर आते हैं। सवाल स्वास्थ्य व्यवस्था के, सवाल खनिज लूट के, सवाल बच्चों के भविष्य के और सवाल उस लोकतंत्र के, जो तभी तक ज़िंदा रहता है जब तक जनता प्रश्न करती है। यह लेख उन सवालों का दशगात्र नहीं, बल्कि उस भरोसे की आवाज़ है, जो अब भी टूटने से पहले चेतावनी देता है..."                    

रायसेन जिले की दस दिन की घटनाओं का लेखा-जोखा 

दशगात्र

जब सवाल ज़िंदा हों, तब लोकतंत्र ज़िंदा रहता है...*

हरीश मिश्र

लो, बसंत आ गया।
शीत ऋतु के बाद हवा मदमस्त है, आमों पर बौर हैं, सरसों पीली हो चुकी है और बसंत पंचमी के दिन स्वास्थ्य विभाग के आंगन में भी बसंत ने दस्तक दे दी।
     हाईकोर्ट के आदेश से डॉ. मांडरे फिर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी बन गए।
राज्य मंत्री की नाराज़गी के जो बादल मंडरा रहे थे, वे बिना बरसे आगे बढ़ गए। 
     मतलब साफ़, स्वास्थ्य विभाग जैसा पहले था, आगे भी वैसा ही रहेगा।
पहले ‘नारायण’ के भरोसे था, अब ‘हरिनारायण’ के भरोसे है। दोनों को आउट सोर्स का अच्छा अनुभव है और विभाग प्रमुख को अनुभव का ही सहारा है।
       डॉ. खत्री सर्जन हैं, इसलिए जाते-जाते सरकारी अलमारी पर प्लास्टर चढ़ा गए, अब देखना है प्लास्टर कौन खोलेगा।
    जिला अस्पताल में समय पर इलाज न मिलने से सफाई दरोगा चुन्नीलाल चल बसे। परिजन कहते हैं वेंटिलेटर बंद था।
अस्पताल प्रबंधन कहता है—21 में से 16 चालू हैं।
सच तो यह है कि मौत को बहाने की ज़रूरत  पड़ती है, वैसे पूरा सिस्टम  ही वेंटिलेटर पर  है।

पत्थर की तकदीर बदलती है, पत्थरों से भी तक़दीर बदलती है। रायसेन क्षेत्र मेें 
आफताब ने ना जाने कितनों की तकदीर-तस्वीर बदली है। आफताब का अर्थ होता है सूरज और इस सूरज की रोशनी और चमक में ना जाने कितने खनिज, राजस्व, वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी, जनप्रतिनिधियों की किस्मत चमक चुकी है। जो चमक चुके उन्होंने माल लिया और जो चमका चुके उन्होंने दोगुना माल लिया।
   पिछले साल हकीमखेड़ी में अवैध उत्खनन रोकने पर वनकर्मियों का हकीम भाईयों ने खड़े खड़े “इलाज” किया था।
इस बार कान पोहरा में बंद पड़ी पत्थर खदानों पर छापा पड़ा—
पर छापे से पहले ही राहु ने खेला कर दिया‌। सूरज की पहली भोर से पहले ही के कानों तक खबर पहुंचा दी । नतीजा, अवैध खनन तो मिला, लेकिन अवैध खनिज कर्ता फरार हो गए। खनिज विभाग में इस समय राहु की दशा चल रही है, विभाग की हर गतिविधि की खबर  तरंगों के माध्यम से पहुंच जाती है।
     यूजीसी के खिलाफ हथकड़ी पहनकर हुए प्रदर्शन की तस्वीरें
जिला, प्रदेश और देश की मीडिया में चमकीं—
सवाल वहीं रह गए, तस्वीरें आगे निकल गईं।
    जुझारपुर के बच्चे अंधेरे से जूझ रहे हैं, अंधेरे से लड़ने गैरतगंज आए। उन्हें रोशनी नहीं,धक्का मिला। जिनका वादा अंधेरा मिटाने का था, वही भविष्य को मंच से नीचे धकेलने लगे। मंच पर बैठे पूर्व मंत्री और विधायक बच्चों से उलझ गए और बसंत की कलियां कुचल डाली।
   श्रीमान‌् ! उम्मीद में अपना समझकर अपने मंच पर पहुंच जाते हैं और सुनवाई न होने पर उलाहना देते हैं। यह उलाहना विद्रोह नहीं है। यह नाराज़गी है । यह अपनेपन का अधिकार है। शिकायतें अविश्वास की उपज नहीं हैं। यह उस भरोसे की आवाज़ हैं, जो आपको अपना मानती है।
जनता में गुस्सा है, क्योंकि उसने आपसे ज्यादा उम्मीद की है।
जनता प्रश्न कर रही है, क्योंकि उसने आपको अपना प्रतिनिधि माना है।
उलाहना वहीं दिया जाता है, जहां विश्वास बचा होता है। जहां रिश्ता होता है और शायद इसी भरोसे के कारण यह आवाज़ आज भी धीमी है, कटु नहीं। श्रीमान !
इस उलाहने पर नाराज़ न हों, धक्का ना दें 
इसे शिकायत नहीं, संकेत समझें।
क्योंकि जब जनता सवाल करना छोड़ देती है—
तब लोकतंत्र सचमुच बीमार पड़ जाता है।

लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )