दिव्य चिंतन

राम नाम की भोर...

हरीश मिश्र
( 9584815781 )

     अरुणोदय के समय जब शहर गहरी नींद की चादर ओढ़े सोता है, तब रायसेन के अर्जुन नगर की गलियों में दो आवाज़ें सुनाई देती हैं, पहली पंछियों के चहकने की, और दूसरी रामधुन की।
    न मंच, न माइक, न भीड़ जुटाने की कोई कवायद, न पुलिस की चौकस व्यवस्था। न कोई शोर, न कोई शक्ति प्रदर्शन। हर दिन, बिना किसी आह्वान के, महिलाएं श्रृंगार कर, बच्चे स्नान कर  अपने घरों के बाहर खड़े होकर रामभक्त मंडली के स्वागत में रंगोली सजाते हैं, दीप जलाते हैं। फूलों की मालाएं और प्रसादी लिए, आंखों में अहिल्या की तरह एक अनकही प्रतीक्षा संजोए इंतजार करते हैं। यह दृश्य केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि भाव का साक्षात रूप है। मानो त्रेता युग की स्मृति आज भी इन गलियों में सांस रही हो।
     मेरी झोपड़ी में राम भक्तों की  मंडली आएगी, तो भाग्य खुल जाएंगे, इस अटूट विश्वास के साथ हर घर, हर आंगन दीपमालिका से जगमगा उठता है।
   यहां हर घर अयोध्या है और हर मन में उत्साह।

उजियारी नगरि सोभा अति भारी,
हरषित भए सब नर नारी।।

सुबह 5:30 बजे हरसिद्धि मंदिर में संकटमोचक की आरती के पश्चात जैसे ही ध्वजवाहक ध्वज लेकर आगे बढ़ता है, उसके पीछे-पीछे “सीताराम… सीताराम…” की ध्वनि गाते साधक चल पड़ते हैं।
जैसे ही यात्रा किसी घर के सामने पहुंचती है, उस घर के लोग ध्वज पर विराजमान लक्ष्मण-प्राणदाता की आरती कर श्रद्धा से यात्रा में सम्मिलित हो जाते हैं।
आज के समय में, जब धर्म अक्सर शोर और शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनता जा रहा है, तब इस मंडली के कदम एक शांत प्रतिवादी की तरह उभरती है। यह बताती है कि भक्ति का सबसे सशक्त रूप वही है, जो भीतर से उपजे—बिना किसी आडंबर के।
शायद इसलिए यह यात्रा “अद्भुत” है।
क्योंकि यह दीपों की तरह है—
धीमी, स्थिर… लेकिन अंधकार को हराने के लिए पर्याप्त।
“सीताराम… सीताराम…”
यह केवल जप नहीं,
यह अयोध्या की वह लौ है—जो आज भी इन गलियों में निरंतर जल रही है।

लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )