दिव्य चिंतन

गेहूं खरीदी केन्द्रों पर वसूला जा रहा है- 

सहकारिता टैक्स


हरीश मिश्र ( 9584815781 )

1893 की अंग्रेजी हुकूमत में चंपानेर का आसमान सूखा था, आज रायसेन जिले में व्यवस्था सूखी है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब बादल नहीं बरसते थे, अब नीयत नहीं बरसती।
   लगान फिल्म (2001) की कहानी 1893 के उस भारत की है, जहां गोरी चमड़ी वाले हुक्मरान किसानों की हड्डियों तक से कर वसूलते थे। चंपानेर के खेतों में अन्न नहीं, आंसू उगते थे। सूखा था, भूख थी और ऊपर से लगान देना पड़ता था।भूख के जख्म पर लगान का नमक छिड़का जाता था।
    फिर आया रसेल ! अंग्रेज अधिकारी, जिसने अन्याय को खेल का रूप दे दिया। भूखे-प्यासे किसानों को क्रिकेट की चुनौती… जीतोगे तो तीन साल लगान (कर/टैक्स) से मुक्ति, हारोगे तो तीन गुना लगान की सजा।
    फिल्म के नायक भुवन ने बल्ला उठाया था, लेकिन असल में उसने हिम्मत उठाई थी। काका का अनुभव, कचरा का हुनर और गांव की एकता जीती थी। यहां टीम सिर्फ खेल नहीं रही थी, वह अन्याय के खिलाफ जनमत तैयार कर रही थी।
  आखिरी गेंद पर जब जीत मिली, तो सिर्फ अंग्रेज नहीं हारे थे, बल्कि अत्याचार की एक सोच हारी थी, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती…
    2026 में भी लगान चल रही है, बस कैमरे बंद हैं और किरदार बदले हुए हैं।
    रायसेन जिले के गेहूं खरीदी केंद्रों पर आज भी किसान खड़ा है, भूखा-प्यासा, थका हुआ, झुका हुआ और लुटा हुआ।
    फर्क इतना है कि अब कोई रसेल अधिकारी सामने नहीं आता, जो खुले में चुनौती दे। अब खेल पर्दे के पीछे होता है, किसान की किस्मत उलझी हुई है सॉफ्टवेयर में, तराजू के कांटे में, बोरी के वजन में और ‘सहकारिता लगान’ के नाम पर वसूले जा रहे टैक्स में।
    तब तीन गुना लगान की धमकी थी, आज चुपचाप 50 किलो गेहूं को 55–57 किलो तौला जा रहा है। तब भुवन था, आज किसानों का कोई नायक नहीं है  या जो नायक हैं, उन पर किसानों को भरोसा नहीं है।
     समर्थन मूल्य पर खरीदी की कहानी भी अब ‘मूल्य’ से ज्यादा ‘जुल्म’ की लगती है। इसमें हिस्सा सिर्फ अनाज का नहीं बंटता, बल्कि किसान के खून-पसीना  का  बंटवारा हो रहा है और हिस्सेदार हर श्रीमान हैं।
    इसमें हिस्सा है—न्यौछावर देकर खरीदी केंद्र बनवाने में सफल वेयरहाउस मालिक का, पूजन कर तोल कांटा शुरू करने वाले प्रबंधकों का, किसानों के ललाट पर टीका और माला पहनाने वाले नेताओं का, बार-बार निरीक्षण करने वाले अधिकारियों का और तौल करने वाले हम्माल का।
   अंत में किसान के हिस्से में आता है—सहकारिता लगान! 
क्या कोई भुवन खड़ा होगा? या ना अत्याचार ना भ्रष्टाचार का नारा देकर सत्ता में आने वाले हुक्मरान किसानों की हड्डियों से कर वसूलना बंद करेंगे ?
या फिर यह नई लगान-2 बिना शोर के हर साल  बनती रहेगी…?

लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार)