दिव्य चिंतन

जहाँ कर्तव्य ही भक्ति बन जाए...

हरीश मिश्र ( 9584815781 )

   अंजनी के लाला, पवन पुत्र हनुमान जी से प्रेरणा लें, जिम्मेदारी क्या होती है।
   जिम्मेदारी! यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि वह तप, निष्ठा और कर्तव्य है, जो व्यक्ति को साधारण से असाधारण बनाता है। यह वही भाव है, जो कर्तव्य को पूजा और कर्म को साधना बना देता है।
रामायण में गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं—
“राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहाँ विश्राम।”
    यह केवल हनुमान जी का वचन नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का शाश्वत मंत्र है। जब तक कर्तव्य पूरा नहीं होगा, तब तक मुझे विश्राम का अधिकार नहीं है।
    हनुमान चालीसा में भी यही भाव प्रकट होता है—
“राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।”
    यहाँ ‘दूत’ शब्द केवल पहचान नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का प्रतीक है। दूत वह होता है, जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर किसी और के उद्देश्य को अपना बना ले। लक्ष्मण-प्राणदाता ने यही किया—उन्होंने भगवान राघव के कार्य को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
    हनुमानाष्टक का यह छंद जिम्मेदारी के चरम को दर्शाता है—
“बाल समय रबि भक्षि लियो तब, तीनहुं लोक भयो अंधियारो।”
यह केवल बाललीला नहीं, यह संकेत है कि शक्ति जब जिम्मेदारी से जुड़ी हो, तभी उसका अर्थ है। अन्यथा वही शक्ति अंधकार का कारण भी बन सकती है।
और आगे,
“दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।”
    यह पंक्ति बताती है कि जब व्यक्ति जिम्मेदारी को स्वीकार कर लेता है, तो कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो जाते हैं। जिम्मेदारी, दरअसल, आत्मविश्वास का दूसरा नाम है।
    आज के दौर में सबसे बड़ा संकट संसाधनों का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी स्वीकार करने के अभाव का है।
    ऐसे समय में हनुमान का चरित्र हमें यह सिखाता है कि—
जिम्मेदारी कोई बोझ नहीं, बल्कि विश्वास है।
जवाबदेही कोई दबाव नहीं, बल्कि आत्मसम्मान है।
    अंततः, जिम्मेदारी वही है, जो बिना किसी ताली या प्रशंसा के भी निभाई जाए।
     वह वही भक्ति है, जिसमें फल की इच्छा नहीं, केवल कर्तव्य की निष्ठा हो और शायद यही कारण है कि हनुमान पूज्यनीय हैं, क्योंकि उन्होंने शक्ति से पहले जिम्मेदारी को चुना,
और कर्म से पहले जवाबदेही को।

लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )