कोचिंग संस्थानों पर नियंत्रण : राजस्थान की पहल से अन्य सरकारों को सीख लेना जरुरी जरूरी
संदीप सिंह गहरवार
देश में कोचिंग संस्थान अब एक समानांतर शिक्षा व्यवस्था का रूप ले चुके हैं। हर छोटे-बड़े शहर में इनका वर्चस्व लगातार बढ़ रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए यह संस्थान कभी-कभी आशा की किरण तो कभी आर्थिक व मानसिक बोझ का कारण बन जाते हैं। फीस की मनमानी, पारदर्शिता का अभाव, छात्रों पर अनावश्यक दबाव, आत्महत्या की घटनाएं और प्रशासनिक लापरवाही ने इस पूरे क्षेत्र को “शिक्षा माफिया” के शिकंजे में जकड़ दिया है। इसी पृष्ठभूमि में एक पखवाड़े पहले राजस्थान विधानसभा में पारित कोचिंग सेंटर (नियंत्रण एवं विनियमन) विधेयक एक ऐतिहासिक कदम है। इससे कोचिंग संस्थानों की मनमानी पर अंकुश लगाने और विद्यार्थियों के हितों की रक्षा करने का रास्ता खोल दिया है।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली राजस्थान सरकार ने विधानसभा में जो कानून पारित किया है उसके अनुसार 100 या उससे अधिक छात्रों वाले कोचिंग संस्थानों के लिए पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है। कोचिंग संस्थाओं को छात्रों के प्रवेश से पूर्व फीस संरचना की पूरी जानकारी देना अनिवार्य कर दिया है। इसके साथ ही एकमुश्त फीस वसूलने पर रोक लगाई गई है, छात्रों द्वारा बीच में पढ़ाई छोड़ने पर शेष अवधि की फीस लौटाना अनिवार्य कर दिया गया है। सबसे महत्वपूर्ण निर्णय है कि कोचिंग संस्थाओं द्वारा पहली बार नियमों के उल्लंघन पर 50 हजार, दोबारा उल्लंघन पर 2 लाख रुपए जुर्माना का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही बार-बार नियम तोड़ने पर कोचिंग संस्थान का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया जाएगा। राज्य स्तर पर कोचिंग सेंटर प्राधिकरण और जिला स्तर पर कलेक्टर की अध्यक्षता में समितियां बनाई जाएंगी। छात्रों- अभिभावकों के लिए 24 घंटे कॉल सेंटर, वेब पोर्टल और हेल्पलाइन की व्यवस्था का प्रावधान किया गया है। यह विधेयक विद्यार्थियों के लिए राहत की सांस है। फीस संबंधी पारदर्शिता, रिफंड और शिकायत निवारण की व्यवस्था उनके अधिकारों को मजबूत करेगी।
कोचिंग माफिया का जाल और सरकारी लापरवाही
पिछले दो दशकों में कोचिंग उद्योग कई हजार करोड़ का कारोबार बन चुका है। बड़े शहरों के कोचिंग हब, जैसे कोटा, पटना, दिल्ली, हैदराबाद, प्रयागराज में लाखों विद्यार्थी शिक्षा माफिया के चंगुल में हैं। कई जगह कोचिंग संस्थाओं द्वारा मनमानी फीस वसूली जाती है। कई संस्थान लाखों रुपए एकमुश्त लेते हैं और बीच में पढ़ाई छोड़ने पर पैसा लौटाने से इनकार करते हैं। झूठे वादे और विज्ञापन के जरिए चयन दर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए जाते हैं, जिससे अभिभावक भ्रमित होते हैं। भारत में निजी कोचिंग उद्योग का विस्तार अत्यंत तीव्र रहा है। साल 2013 में एसोचैम ने इसका आकार 40 अरब डॉलर (2.39 ट्रिलियन) तक पहुँचने का अनुमान लगाया था। कोटा को "भारत की कोचिंग राजधानी" कहा जाता है। वहाँ हर वर्ष लगभग 1.5 से 2.5 लाख विद्यार्थी आते हैं और कोचिंग उद्योग का वार्षिक कारोबार 3,500 से 7,000 करोड़ तक था, जो अब घटकर 3,500 करोड़ के आसपास रहा है। 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, हर चौथा (25 प्रतिशत) आईआईटी प्रवेशार्थी ने अपनी तैयारी कोटा से की है।
अभिभावकों के ऊंचे सपने और कोचिंग संस्थाओं के मानसिक दबाव से देश में छात्रों की आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। केवल राजस्थान के कोटा में हर साल दर्जनों छात्र आत्महत्या कर लेते हैं। कोटा में 2023 में 26 छात्र, 2024 में 17 और 2025 के मध्य तक 15 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। इसके अलावा, राज्य विधानसभा में जारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले चार वर्षों में कुल 88 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं, जिनमें से 70 कोटा में, 14 सीकर में और बाकी अन्य जगहों पर हुईं।
कोचिंग संस्थाओं को लेकर प्रशासनिक अक्षमता और संलिप्तता भी कई बार सामने आती है। कई बार शिकायतों के बावजूद अधिकारियों की उदासीनता से शिक्षा माफिया और ताकतवर हो गया है। दरअसल, कोचिंग संस्थानों और सत्ता प्रतिष्ठान के बीच गठजोड़ ने पूरे क्षेत्र को “रेग्युलेटेड अराजकता” में बदल दिया है, जहां अभिभावक लुटते हैं और छात्र दबाव में टूट जाते हैं।
अब अन्य राज्यों को क्यों उठाना चाहिए कदम
राजस्थान सरकार की पहल केवल एक राज्य तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय मॉडल बननी चाहिए। बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र, तेलंगाना जैसे राज्यों में कोचिंग उद्योग का विस्तार बहुत बड़ा है। इन राज्यों को भी ऐसे प्रावधान लागू करने चाहिए ताकि फीस और रिफंड की पारदर्शिता अनिवार्य हो, छात्रों की मानसिक सेहत की निगरानी हो, इसके अलावा आत्महत्या जैसी घटनाओं की रोकथाम के लिए काउंसलिंग और हेल्पलाइन उपलब्ध होनी चाहिए। छोटे कोचिंग संस्थानों पर भी आंशिक निगरानी रहे ताकि वे लूपहोल्स का फायदा न उठा सकें। कोचिंग संस्थाओं को लेकर राजस्थान सरकार का कानून स्पष्ट संदेश देता है कि शिक्षा अब बाजार की मनमानी पर नहीं छोड़ी जा सकती। पारदर्शी फीस और रिफंड व्यवस्था से अभिभावकों को राहत मिलेगी और उनकी आर्थिक सुरक्षा हो सकेगी। शिकायत निवारण तंत्र और कॉल सेंटर बनने से छात्रों को असहाय होने से बचाया जा सकेगा, इससे उन्हें सहारा मिल सकेगा। इस निर्णय से समाज के लिए संदेश दिया गया है कि शिक्षा को केवल व्यापार मानकर लूटने वालों को अब कानून का डर रहेगा। कोचिंग उद्योग की अंधाधुंध बढ़ती ताकत शिक्षा की आत्मा को निगल रही है। राजस्थान सरकार ने साहसिक पहल कर यह दिखाया है कि सख्त कानून से शिक्षा माफिया की पकड़ कमजोर की जा सकती है।
राजस्थान का नया कोचिंग नियमन बिल राज्य में शिक्षा के व्यापारीकरण पर अंकुश लगाकर छात्रों को न्याय दिलाने की दिशा में पहले कदम जैसा है। यह केवल नियम नहीं, बल्कि एक संविधानिक चेतावनी है कि शिक्षा को बिजनेस नहीं, जीवन और समाज का अंग होना चाहिए। यदि अन्य राज्य भी इसी राह पर चलें तो लाखों विद्यार्थियों और अभिभावकों का भविष्य सुरक्षित होगा। यह केवल एक राज्य का नहीं, बल्कि पूरे देश के शिक्षा और समाज के आत्मसम्मान का प्रश्न है। अब समय आ गया है कि सभी राज्य राजस्थान की इस पहल को अपनाकर शिक्षा को व्यवसाय नहीं, सेवा बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाएं। यदि अन्य राज्य इस राह का अनुसरण करें, तो यह केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि शिक्षा का आत्म-संरक्षण बन जाएगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)



