(ब्रजेश जोशी)

इंदौर l वर्ष प्रतिपदा यानी गुड़ी पड़वा का दिन हमारे वैदिक सनातन काल गणना के पंचांग के अनुसार विक्रम संवत का नया वर्ष होता है।चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि कई स्वरूप में महत्वाकारी होती है। विक्रम संवत के अनुसार तो यह भारतीय नव वर्ष है ही साथ ही गुड़ी पड़वा का भी यह विशिष्ट पर्व है चैत्री नवरात्रि का भी शुभारंभ का यही दिवस है। 

भारत की नई पीढ़ी पाश्चात्य प्रवृत्तियों से ज्यादा प्रभावित होती है लेकिन उन्हें अपने देश के भी पारंपरिक ज्ञान और परंपराओं को सीखना समझना चाहिए। क्योंकि दुनिया का विज्ञान भारत के ज्ञान की कोख से ही उत्पन्न हुआ है। काल गणना में हमारी वैदिक परंपरा का कोई सानी नहीं है एकमात्र हमारा ही कालचक्र अपने पंचांग के आधार पर यह प्रदर्शित करता है कि 100 साल बाद या 500 साल बाद या हजार साल बाद कब क्या कौन सा ग्रह नक्षत्र ग्रहण आदि होगा।नई पीढ़ी को हम यह बताना चाहते हैं कि वह हमारी परंपराओं को केवल एक धर्म व अध्यात्म के रूप में ही ना लें क्योंकि जिस विज्ञान को नई पीढ़ी सबसे ज्यादा प्रमाणिक मानती है  उस विज्ञान का आधार ही हमारा ज्ञान है।

इसलिए यदि हमारे वेद पुराण उपनिषदों को  फिजिक्स केमेस्ट्री मैथमेटिक्स में 100 में से 99 या 98 ओर 100 नंबर भी लाने वाली पीढ़ी उसी तर्ज पर पढ़े उसका अध्ययन करें तो तय बात है कि उनके जीवन की दशा और दिशा बदल जाएगी और देश को भी भविष्य में ऐसी पीढ़ी मिलेगी जो वैदिक ज्ञान से परिपूर्ण होगी और इस ज्ञान के आधार पर जो विज्ञान मुखरित होगा वह भारत को पुनः विश्व गुरु बनाएगा।इसलिए नव वर्ष की बधाई के साथ हम चाहेंगे कि हमारे देश की युवा पीढ़ी भारतीय नव वर्ष के महत्व को समझें। ओर इसे एक विज्ञान के रूप में आत्मसात करें।