गाड़ी पंचर इंसाफ अधूरा : गोली अगर सीने में लगी होती तो जनता ताली बजा रही होती, जोरदार अभिनंदन कर रही होती..
दिव्य_चिंतन
हरीश मिश्र ( 9584815781 )
...लाल, गुलाबी, नीली, पीली, रंग-बिरंगी... खट्टे-मीठे स्वाद से रिश्तों का एहसास कराती… टॉफी! बदनाम हो गई।
दर्द की दास्तान शुरू होती है 21 नवंबर जुमेरात से। पांजरा गांव में
मासूम बच्ची, जिसे सलमान ‘चाचा’ बोलती थी, उसी दरिंदे ने टॉफी देकर उसकी जिंदगी को बदरंग कर दिया।
गरीब परिवार ने पहले अपनी मुस्कान को आंगन में खोजा… फिर पड़ोस में… और फिर उस गली के कोने में जहां से अक्सर बच्ची की खिलखिलाहट सुनाई देती थी।
बच्ची बदहवास मिली।
बुदबुदाते हुए बोली—
“मां… सलमान चाचा ने टॉफी…” और बेहोश हो गई। मासूम को अस्पताल लाया गया, पर सरकार का स्वास्थ्य विभाग ही बेहोश मिला।
फिर एक टॉफी जन-आक्रोश का कारण बन गई। हर संवेदनशील नागरिक की एक आंख में आंसू और दूसरी में खून उतर आया...आंसू उस मासूम के लिए और खून उस दरिंदे के लिए। कंपकंपाती ठंड में हिंदू समाज हाथों में पत्थर, होठों पर नारे लगाते हुए हाइवे पर उतर आया। हाइवे जाम हो गया। छह दिन तक जिले में सन्नाटा और प्रदेश में सनसनी फैल गई। जिस गांव में डंपर धूल उड़ाते थे, वहां पुलिस चप्पे-चप्पे पर खाक छान रही थी।
महिलाएं चूल्हा-चौका छोड़कर थाने और सड़कों पर बैठ गईं। हर संवेदनशील नागरिक गुस्से से लाल था। एक टॉफी हैवानियत में बदल गई।
भाईचारा और सद्भावना की दीवार में दरार पड़ गई। हर हिंदू मुसलमान को, और हर मुसलमान हिंदू को संदेह की निगाह से देखने लगा।
जो सरकार जोरदार “अभिनंदन करो” का उद्घोष करती थी, उसके माथे पर बल पड़ गए।
पुलिस कप्तान को बदल दिया गया।जन-आक्रोश का अलाव जलने लगा। एक टॉफी की कीमत तीस हजार हो गई।
तभी खबर आई—जमुरात को दरिंदा गांधी नगर, भोपाल में मकान ढूंढ़ता घूम रहा है। कुछ मुस्लिम युवकों ने उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। भोपाल पुलिस ने उसे रायसेन पुलिस को सौंपा।
दो वाहनों से उसे गौहरगंज लाया जा रहा था कि रास्ते में गाड़ी पंचर हो गई।
उसी वक्त, हैवान के हाथों में पुलिस की गन आ गई...उसने फायर कर दिए...हवा में गर्मी फैल गई...खाकी भी अपने रंग में आ गई। गोली चली...पर छाती नहीं, पांव में लगी। जनता का आक्रोश थोड़ा कम हुआ,
पर अफसोस भी उतना ही गहरा।
काश! गाड़ी पंचर होने के बाद गोली पांव में नहीं, छाती चीर देती...हैवानियत कफ़न में होती… और इंसाफ पूरा होता...जनता ताली बजा रही होती... और जोरदार_अभिनंदन कर रही होती।
लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )



